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हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: भर्ती एवं सेवा शर्त अधिनियम 2024 रद्द

हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने भर्ती एवं सेवा शर्त अधिनियम 2024 को रद्द कर दिया है, जिससे हजारों कर्मचारियों को राहत मिली है। यह निर्णय न्यायपालिका और सरकार के अधिकार क्षेत्र की सीमाओं को स्पष्ट करता है। कोर्ट ने अधिनियम की कई धाराओं को असंवैधानिक करार दिया और संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे कर्मचारियों को तीन महीने के भीतर सभी वित्तीय लाभ प्रदान करें। जानें इस महत्वपूर्ण फैसले के पीछे की कहानी और इसके प्रभाव।
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हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: भर्ती एवं सेवा शर्त अधिनियम 2024 रद्द

महत्वपूर्ण न्यायिक निर्णय

शिमला: हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण निर्णय लेते हुए हिमाचल प्रदेश भर्ती एवं सरकारी कर्मचारियों की सेवा शर्त अधिनियम, 2024 को पूरी तरह से रद्द कर दिया है। इस फैसले से प्रदेश के हजारों कर्मचारियों को राहत मिली है और उनके लंबित वित्तीय लाभ प्राप्त करने का मार्ग प्रशस्त हुआ है। न्यायमूर्ति विवेक सिंह ठाकुर और न्यायमूर्ति रोमेश वर्मा की खंडपीठ ने 445 याचिकाओं की एक साथ सुनवाई करते हुए इस अधिनियम को असंवैधानिक घोषित किया।


अदालत ने अपने निर्णय में स्पष्ट किया कि अधिनियम की धारा 3, 5 और 9 संविधान के प्रावधानों के खिलाफ हैं। कोर्ट ने कहा कि जब इन महत्वपूर्ण धाराओं को हटाया जाता है, तो अधिनियम में कोई सार्थक प्रावधान नहीं बचता, इसलिए इसे पूरी तरह से निरस्त करना आवश्यक है। हाई कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि इस अधिनियम के तहत राज्य सरकार या उसके अधिकारियों द्वारा की गई सभी कार्रवाइयां असंवैधानिक और अमान्य मानी जाएंगी। इसके तहत जारी सभी आदेश और कर्मचारियों से लाभों की वापसी से संबंधित प्रस्ताव भी रद्द कर दिए गए हैं।


अदालत ने संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया है कि वे सक्षम अदालतों के आदेशों के अनुसार कर्मचारियों को तीन महीने के भीतर सभी वित्तीय लाभ सुनिश्चित करें।


यह मामला उन हजारों कर्मचारियों से संबंधित है जिन्हें प्रारंभ में अनुबंध के आधार पर नियुक्त किया गया था। 2003 के बाद इन कर्मचारियों को चरणबद्ध तरीके से नियमित किया गया, लेकिन उनकी अनुबंध अवधि को नियमित सेवा में शामिल नहीं किया गया और उन्हें वित्तीय लाभ से वंचित रखा गया। कर्मचारियों ने इस निर्णय को अदालत में चुनौती दी और सुप्रीम कोर्ट में भी मामला जीत लिया। इसके बावजूद, राज्य सरकार ने 2024 में इस अधिनियम को लागू कर पहले दिए गए वित्तीय लाभों को वापस लेने का प्रयास किया।


याचिकाकर्ताओं का कहना था कि सरकार ने इस अधिनियम के माध्यम से न्यायपालिका के फैसलों को पलटने का प्रयास किया, जो उसके अधिकार क्षेत्र से बाहर है। उनका तर्क था कि किसी भी न्यायिक निर्णय को केवल न्यायपालिका ही बदल सकती है, न कि विधायिका। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि 17 जुलाई 2025 को इस अधिनियम के तहत लाभ वापसी के आदेश जारी किए गए, जो पूरी तरह असंवैधानिक थे।


हाईकोर्ट के इस निर्णय से अब प्रदेश के हजारों कर्मचारियों को न केवल राहत मिली है, बल्कि उनके बकाया वित्तीय लाभ प्राप्त करने की प्रक्रिया भी तेज होगी। यह निर्णय प्रशासनिक और कानूनी दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि इससे सरकार और न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र की सीमाएं स्पष्ट होती हैं।