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ईरानी ड्रोन हमले में अमेरिकी सैनिकों के दावों पर सवाल उठे

मध्य-पूर्व में चल रहे संघर्ष के बीच, अमेरिकी सैनिकों ने 1 मार्च को कुवैत के शुएबा बंदरगाह पर हुए ईरानी ड्रोन हमले के बाद पेंटागन के दावों को झूठा बताया है। सैनिकों ने खुलासा किया कि उनकी यूनिट हमले के लिए तैयार नहीं थी और सुरक्षा उपायों की कमी थी। इस हमले में छह सैनिकों की मौत हुई और कई अन्य घायल हुए। जानें इस हमले की सच्चाई और अमेरिकी सेना की स्थिति के बारे में।
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ईरानी ड्रोन हमले में अमेरिकी सैनिकों के दावों पर सवाल उठे

संघर्ष के बीच अमेरिकी सैनिकों की आवाज़

मध्य-पूर्व में चल रहे संघर्ष के दौरान, अमेरिकी सेना और पेंटागन के दावों पर गंभीर सवाल उठ खड़े हुए हैं। 1 मार्च को कुवैत के शुएबा बंदरगाह पर हुए ईरानी ड्रोन हमले में बाल-बाल बचे अमेरिकी सैनिकों ने पहली बार खुलकर अपनी सरकार के दावों को "झूठ" बताया है।


इजरायल और अमेरिका के संयुक्त हमले में ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की हत्या के बाद, ईरान ने क्षेत्र में सभी अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाना शुरू कर दिया। इस हमले में अमेरिकी सेना के रिज़र्व के छह सदस्य मारे गए और 20 अन्य घायल हुए। यह अमेरिका को इस संघर्ष में हुआ पहला नुकसान था। अमेरिकी युद्ध सचिव पीट हेगसेथ ने कहा था कि यह हमला एक ईरानी "स्क्वर्टर" ड्रोन द्वारा किया गया था, जो कि किलेबंद बेस की सुरक्षा प्रणाली को चकमा देने में सफल रहा। लेकिन बच निकले सैनिकों ने पेंटागन के दावों को गलत बताया और कहा कि उनकी यूनिट - 103वीं सस्टेनमेंट कमांड - "तैयार नहीं" थी।


सैनिकों की आपबीती

CBS News से बातचीत में, एक घायल सैनिक ने कहा कि उनकी यूनिट अपनी सुरक्षा के लिए "तैयार नहीं" थी। उसने यह भी बताया कि बेस कोई "किलेबंद" स्थान नहीं था। नाम न बताने की शर्त पर उस सैनिक ने कहा, "यह दिखाना कि 'एक ड्रोन किसी तरह अंदर घुस आया' - यह बात बिल्कुल गलत है।"


'सब कुछ हिल गया'


अमेरिकी सैनिकों ने कहा कि उनकी यूनिट को ईरानी मिसाइलों और ड्रोनों की मारक सीमा के करीब लाया गया था। उन्होंने बताया कि सुबह मिसाइल हमले की चेतावनियाँ मिलने के बाद उनकी यूनिट ने सुरक्षित स्थानों पर पनाह ली थी, लेकिन ड्रोन हमले से पहले "खतरा टल जाने का संकेत" दे दिया गया था। एक सैनिक ने CBS News को बताया कि इसके तीस मिनट बाद ड्रोन हमला हुआ और "सब कुछ ज़ोर से हिल गया।"


उस सैनिक ने कहा, "यह कुछ वैसा ही था जैसा आप फिल्मों में देखते हैं। आपके कानों में ज़ोर की गूंज होती है। सब कुछ धुंधला सा लगता है। आपकी नज़र धुंधली हो जाती है। आपको चक्कर आने लगते हैं। हर तरफ धूल और धुआँ होता है।" उसने आगे कहा, "सिर में चोटें, बहुत ज़्यादा खून बहना, कई लोगों के कान के पर्दे फट जाना, और हर तरफ बम के टुकड़े बिखरे होना - लोग अपने पेट, हाथों और पैरों से खून से लथपथ थे।"


सुरक्षा की कमी

अमेरिकी सैनिकों को 'ऑपरेशन एपिक फ्यूरी' शुरू होने से ठीक एक हफ़्ता पहले जॉर्डन और सऊदी अरब में तैनात होने के निर्देश दिए गए थे। उन्हें ईरानी ड्रोन और मिसाइलों की रेंज से दूर रहने की सलाह दी गई थी, लेकिन 103वीं सस्टेनमेंट कमांड के कई सैनिकों को शुएबा बंदरगाह के मिलिट्री आउटपोस्ट पर जाने का निर्देश दिया गया।


सैनिकों ने इसे "एक क्लासिक, पुराना मिलिट्री बेस" बताया, जहाँ छोटे-छोटे बैरियर और कामचलाऊ दफ़्तरों के लिए "टीन की छोटी-छोटी इमारतें" थीं। उन्होंने कहा कि यह बेस "एक जाना-पहचाना निशाना" था और वे केवल खड़े ब्लास्ट बैरिकेड्स से सुरक्षित थे।


एक सैनिक ने CBS News को बताया "हम ईरान के और करीब चले गए, एक बेहद असुरक्षित इलाके में, जो एक जाना-पहचाना निशाना था। मुझे नहीं लगता कि इसके पीछे कभी कोई ठोस वजह बताई गई।"  सैनिक ने आगे कहा  मेरा मतलब है, मैं इसे 'कुछ नहीं' की श्रेणी में रखूँगा। ड्रोन से बचाव की क्षमता के मामले में... कुछ भी नहीं।


हमले के बारे में सैनिकों का जो ब्योरा है, वह पेंटागन के बयान के ठीक उलट है; पेंटागन ने यह भी दावा किया था कि सैनिकों को तुरंत राहत पहुँचाई गई थी। हालाँकि, सैनिकों ने इस बात से इनकार किया और कहा कि घायल सैनिकों को प्राथमिक उपचार उन्होंने खुद ही दिया था। अब तक, अमेरिका की सेना या पेंटागन के किसी भी अधिकारी ने सैनिकों के इन दावों पर कोई टिप्पणी नहीं की है।