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गुरुवायूर मंदिर में विवाद: सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर के कदम पर उठे सवाल

केरल के गुरुवायूर मंदिर में एक सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर द्वारा तालाब में पैर धोने के विवाद ने नई बहस को जन्म दिया है। मंदिर प्रशासन ने इसे अपवित्रता मानते हुए शुद्धिकरण अनुष्ठान किए, जबकि स्वामी सचिदानंद ने गैर-हिंदुओं को मंदिरों में प्रवेश की अनुमति देने की बात की। इस घटना ने सोशल मीडिया पर व्यापक चर्चा को जन्म दिया है। जानें इस विवाद के पीछे का इतिहास और इसके सामाजिक प्रभाव।
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गुरुवायूर मंदिर में विवाद: सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर के कदम पर उठे सवाल

गुरुवायूर मंदिर में विवाद का जन्म

केरल के गुरुवायूर मंदिर में एक सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर द्वारा तालाब में पैर धोने के कारण विवाद उत्पन्न हुआ है। मंदिर प्रशासन ने इसे 'अपवित्रता' मानते हुए छह दिनों तक शुद्धिकरण अनुष्ठान किए। इस पर शिवगिरी मठ के अध्यक्ष स्वामी सचिदानंद ने सवाल उठाते हुए कहा कि अब समय आ गया है कि गैर-हिंदुओं को भी मंदिरों में प्रवेश की अनुमति दी जाए।


फैशन इन्फ्लुएंसर का विवादास्पद वीडियो

फैशन इन्फ्लुएंसर जैस्मिन जाफर ने वीडियो बनाते समय तालाब में पैर धोए, जिसे गंभीर अपराध मानते हुए मंदिर प्रबंधन ने 19 शिवेलियां, 19 विशेष पूजाएं और कई बार शुद्धिकरण अनुष्ठान किए। स्वामी सचिदानंद ने इस पर आपत्ति जताई और कहा कि यह प्रथा आज के प्रगतिशील समाज के अनुकूल नहीं है।


ऐतिहासिक संदर्भ और बदलाव की आवश्यकता

ऐतिहासिक संदर्भ का हवाला


स्वामी सचिदानंद ने बताया कि पहले पिछड़ी जातियों और ईझवा समुदाय को मंदिरों में प्रवेश से रोका जाता था। 'टेम्पल एंट्री प्रोकेलेशन' ने इस भेदभाव को समाप्त किया और इससे हिंदू धर्म और मंदिर उपासना को मजबूती मिली। उन्होंने कहा कि अब गैर-हिंदुओं को मंदिरों में आने की अनुमति देने पर विचार करना चाहिए।


सोशल मीडिया पर विवाद का असर

सोशल मीडिया पर हुआ विवाद


जैस्मिन जाफर का वीडियो वायरल होने के बाद भारी विरोध हुआ। उन्होंने इंस्टाग्राम से वीडियो हटा दिया और सार्वजनिक रूप से माफी भी मांगी। इसके बावजूद, मंदिर प्रशासन ने उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई शुरू कर दी है, जिससे सोशल मीडिया और समाज में व्यापक बहस छिड़ गई है।


मंदिरों का सांस्कृतिक दृष्टिकोण

मंदिरों को सांस्कृतिक धरोहर के रूप में देखें


स्वामी सचिदानंद का कहना है कि मंदिरों को केवल एक धर्म तक सीमित नहीं रखना चाहिए, बल्कि उन्हें आध्यात्मिक और सांस्कृतिक धरोहर के रूप में देखना चाहिए। उन्होंने कहा कि जब पिछली पीढ़ियों ने भेदभाव समाप्त किया, तो अब समय है कि गैर-हिंदुओं को भी प्रवेश का अधिकार मिले। इससे न केवल मंदिर संस्कृति मजबूत होगी, बल्कि समाज में सामूहिक सद्भाव भी बढ़ेगा।