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नए साल की शुरुआत: उम्मीदों और चुनौतियों का सामना

नए साल की शुरुआत हमेशा उत्साह का संचार करती है, लेकिन क्या यह सच में ऐसा है? इस लेख में हम नए साल की चुनौतियों और उम्मीदों पर चर्चा करेंगे। जानें कैसे हम आगे बढ़ सकते हैं और समाज में सकारात्मक बदलाव ला सकते हैं। क्या हम पुराने प्रेम और भाईचारे के दिनों की वापसी कर सकते हैं? इस लेख में जानें।
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नए साल की शुरुआत: उम्मीदों और चुनौतियों का सामना

नए साल का उत्साह और चिंताएँ

नया साल हमेशा उत्साह का संचार करता है। लेकिन क्या यह सच में ऐसा है? हमें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि कोई ऐसा बिंदु न हो जहाँ से हम आगे बढ़ सकें। हर चीज पर संदेह करना और उसे अस्वीकार करना, केवल निराशा की ओर ले जाता है। अब हम एक कविता की रचना कर रहे हैं कि यह नव वर्ष हमें स्वीकार नहीं।


नया साल, नए अवसरों का प्रतीक होना चाहिए। 2025 और अन्य वर्षों में देश और समाज ने कई चुनौतियों का सामना किया है।


शुरुआत में, 2014 में, किसी ने नहीं सोचा था कि स्थिति इतनी खराब हो जाएगी। भाजपा और आरएसएस के विचारों से सभी परिचित थे, लेकिन चुनाव जीतने के बाद देश की चिंता करना किसी ने नहीं सोचा था।


हालांकि, अगर हम वापसी की बात कर रहे हैं, तो यह कोई असामान्य बात नहीं है। मानव स्वभाव हमेशा बेहतर की तलाश में रहता है। अगर ऐसा न होता, तो स्वतंत्रता संग्राम की भावना कभी भी इतनी मजबूत नहीं होती।


110 साल पहले, जब गांधी जी भारत लौटे, तब देश की स्थिति क्या थी? लोग निराश और हताश थे। 1857 के बाद के दमन के जख्म अभी भी ताजे थे।


गांधी जी ने कैसे लोगों को जागरूक किया, यह सबको पता है। उम्मीदें लोगों के स्वभाव का हिस्सा हैं। डर से बाहर निकलना भी चाहते हैं।


नया साल उत्साह का संचार करता है, लेकिन विरोध भी बढ़ता जा रहा है। हर चीज पर संदेह करना और उसे अस्वीकार करना, केवल निराशा की ओर ले जाता है।


यह कविता, भले ही सस्ती हो, कहती है कि यह नव वर्ष हमें स्वीकार नहीं। अगर हिम्मत होती, तो इसे लिखने वाले का नाम प्रचारित किया जाता। लेकिन ऐसा कोई कवि नहीं है जिसका नाम हो और जिसे लोग पहचानें।


भाजपा और आरएसएस का प्रचार तंत्र यह नहीं बताएगा कि दिनकर की असली कविता क्या है।


दिनकर ने 1962 में लिखा था, "गांधी का पी रुधिर जवाहर पर फुंफकार रहे हैं!" यह शब्द आज भी प्रासंगिक हैं।


नया साल केवल एक शुरुआत है, उम्मीदों की भी। लेकिन उम्मीदों को तोड़ना और यथास्थितिवाद फैलाना इनका मुख्य उद्देश्य है।


अगर हमें आगे बढ़ना है और भारत का नाम बनाना है, तो हमें हिम्मत और हौसले को बनाए रखना होगा।


पिछले साल की नाकामयाबियों पर बहुत कुछ लिखा जा सकता है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश की छवि को नुकसान हुआ है। न्यूयॉर्क टाइम्स ने आरएसएस की आलोचना की है।


भारत की संवैधानिक संस्थाएं कमजोर हो गई हैं। धर्मनिरपेक्षता को गहरा आघात लगा है।


अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि कमजोर हुई है। अमेरिका के राष्ट्रपति ने भारत का अपमान किया है।


देश में नफरत और विभाजन की आग फैल गई है। दलित, पिछड़े, आदिवासी, मुस्लिम और महिलाओं के बीच नफरत बढ़ गई है।


महिलाओं की सुरक्षा की स्थिति चिंताजनक है। पहले की तरह अब बलात्कार का समर्थन किया जा रहा है।


देश की अंदरुनी स्थिति पर लिखने के लिए बहुत कुछ है। अब तलवारें खुलकर बांटी जा रही हैं।


यह स्थिति स्वीकार करने योग्य नहीं है। नए साल से उम्मीदें बरकरार हैं। पुराने प्रेम और भाईचारे के दिनों की वापसी की।