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नीता अंबानी ने TIME100 समिट में भारतीय संस्कृति का किया प्रतिनिधित्व

नीता अंबानी ने हाल ही में TIME100 समिट में अपनी उपस्थिति से भारतीय संस्कृति को एक नई पहचान दी। उन्होंने पश्चिम बंगाल की पारंपरिक जामदानी साड़ी पहनकर न केवल फैशन का प्रदर्शन किया, बल्कि भारतीय कारीगरों की कला को भी वैश्विक मंच पर प्रस्तुत किया। इस साड़ी की विशेषता इसकी जटिल डिजाइन और कारीगरों की मेहनत है, जो इसे एक विरासत के रूप में स्थापित करती है। जानें इस साड़ी के पीछे की कहानी और इसके महत्व के बारे में।
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नीता अंबानी ने TIME100 समिट में भारतीय संस्कृति का किया प्रतिनिधित्व

नीता अंबानी का प्रभावशाली प्रदर्शन

अंबाला, 23 अप्रैल। फैशन और व्यापार की दुनिया में नीता अंबानी का नाम हमेशा से ट्रेंड सेट करने के लिए जाना जाता है। हाल ही में आयोजित अंतरराष्ट्रीय 'TIME100 समिट' में उनकी उपस्थिति ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि वे भारतीय संस्कृति की सच्ची ब्रांड एंबेसडर हैं। इस वैश्विक मंच पर वे केवल एक व्यवसायिक नेता के रूप में नहीं, बल्कि भारतीय कला और कारीगरों के कौशल को प्रदर्शित करने वाली प्रतिनिधि के रूप में भी नजर आईं। उन्होंने पश्चिम बंगाल की लुप्त होती पारंपरिक जामदानी साड़ी पहनकर अंतरराष्ट्रीय मीडिया का ध्यान आकर्षित किया।


24 महीने की मेहनत और पद्म श्री कारीगर का कौशल

नीता अंबानी द्वारा पहनी गई यह साड़ी साधारण नहीं है, बल्कि यह बंगाल के फुलिया क्षेत्र के कारीगरों की दो साल की मेहनत का परिणाम है। इस अनमोल साड़ी को पद्म श्री से सम्मानित कारीगर बीरेन कुमार बसाक ने तैयार किया है। उन्होंने इसमें 'मीनाकारी जामदानी' तकनीक का उपयोग किया है, जिसमें सादे कपड़े पर धागों को हाथ से पिरोकर जटिल डिजाइन बनाए जाते हैं। यह प्रक्रिया इतनी बारीकी मांगती है कि इसके एक-एक धागे को बुनने में महीनों का समय लगता है, जो इसे दुनिया के सबसे महंगे और दुर्लभ परिधानों की श्रेणी में खड़ा कर देता है।


संस्कृति और शुभता का संगम

इस जामदानी साड़ी की खूबसूरती इसके पल्लू और बॉर्डर में छिपी है, जो एक जीवंत कहानी बयान करती है। इसके पल्लू को 'नैरेटिव टैपेस्ट्री' का रूप दिया गया है, जिसमें इंसानी आकृतियां, पेड़-पौधे और जानवरों को बेहद सूक्ष्मता से उकेरा गया है।


हस्तशिल्प को नई पहचान देने की पहल

नीता अंबानी का यह कदम केवल फैशन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश के उन लाखों बुनकरों के लिए एक उम्मीद की किरण है जो अपनी कला को जीवित रखने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।


विरासत का प्रतीक

इस साड़ी को एक 'हीरलूम पीस' (विरासत) के रूप में देखा जा रहा है, जिसे पीढ़ी-दर-पीढ़ी संजोकर रखा जा सकता है। हस्तशिल्प और परंपरा के प्रति उनका यह लगाव भारतीय कारीगरों की कला को वैश्विक पहचान दिलाने में मील का पत्थर साबित होगा।