पंडित आज्ञा राम प्रेम: एक प्रेरणादायक पत्रकार की कहानी
पंडित आज्ञा राम प्रेम का योगदान
- उनके कई लेखों पर संसद और विधानसभा में ध्यानाकर्षण प्रस्ताव भी लाए गए थे।
हिमाचल प्रदेश ने कुछ महान व्यक्तियों को जन्म दिया है जिन्होंने समाज के विभिन्न क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। इनमें से एक हैं पंडित आज्ञा राम प्रेम, जिनका नाम सुनते ही उनकी लेखनी की याद आती है। पंडित जी ने अपनी कलम के माध्यम से समाज की सेवा की और कई युवाओं को प्रेरित किया। उन्होंने कठिनाइयों का सामना करते हुए जो स्थान प्राप्त किया, वह उनकी योग्यता का प्रमाण है।
पत्रकारिता में उनके योगदान को देखते हुए, उन्होंने न केवल अपने लक्ष्यों को पूरा किया, बल्कि अन्य युवाओं को भी इस दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। आज देश के विभिन्न समाचार पत्रों में कार्यरत कई पत्रकार उनकी प्रेरणा से ही आगे बढ़े हैं। पंडित जी का जन्म 18 जुलाई 1937 को कांगड़ा जिले के बठरा गांव में हुआ। वे एक संवेदनशील लेखक और रचनाकार थे।
उन्होंने पत्रकारिता के क्षेत्र में 'पत्रकार' नामक पुस्तक लिखकर नए पत्रकारों को मार्गदर्शन दिया। वे संभवतः पहले ऐसे पत्रकार थे जिन्होंने सचित्र फीचर लेखन की परंपरा को शुरू किया। उन्होंने गरीबों के अनुभवों को आधार बनाकर उनकी समस्याओं को उजागर किया।
पंडित जी ने 1964 में 'दैनिक वीरप्रताप' और 'दैनिक वीर अर्जुन' के संवाददाता के रूप में पत्रकारिता की शुरुआत की। 1965 में भारत-पाक युद्ध के दौरान वे युद्ध संवाददाता के रूप में कार्यरत रहे। 1966 में धर्मशाला में दैनिक हिंदी व उर्दू मिलाप, दैनिक पंजाब केसरी और आकाशवाणी शिमला के संवाददाता के रूप में कार्य किया।
उनकी लेखनी ने समाज में जागरूकता फैलाने का कार्य किया। उन्होंने कई पत्रिकाओं में लेख लिखे और उनके नाटक दूरदर्शन पर प्रसारित हुए। उनके लेखों ने संसद में ध्यानाकर्षण प्रस्ताव भी लाए।
पंडित जी ने 'आदर्श निबंध' और 'अमर दीप' जैसी पुस्तकें लिखीं। उन्हें 1982 में 'मातृश्री पुरस्कार' से सम्मानित किया गया। उन्होंने समाज सेवा में भी सक्रिय भूमिका निभाई और अपने गांव में स्कूल की स्थापना की।
उनकी स्पष्टवादिता और पत्रकारिता के प्रति समर्पण ने उन्हें कई राजनीतिज्ञों के संपर्क में लाया। वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी के सिद्धांतों में रुचि रखते थे। 13 जनवरी 1998 को उनका निधन हो गया, जिससे पत्रकारिता के एक युग का अंत हुआ।
-विक्रांत शर्मा।
