भारत में श्रमिकों के कामकाजी घंटे में कमी से बढ़ी अशांति
श्रमिकों की स्थिति में गिरावट
पीएलएफएस के अनुसार, श्रमिकों को कोरोना महामारी के पहले सप्ताह में जितने घंटे काम मिलते थे, अब उनकी संख्या में कमी आई है। इससे श्रमिकों की सौदेबाजी की क्षमता में गिरावट आई है और कार्य स्थितियों में भी बिगड़ाव आया है, जिसके परिणामस्वरूप श्रमिक अशांति बढ़ रही है.
2025 में श्रमिकों के लिए कामकाजी घंटे
भारत में 2025 में श्रमिकों के लिए उपलब्ध कामकाजी घंटे कम हो गए हैं। यह जानकारी हाल के आवधिक श्रम शक्ति सर्वेक्षण (पीएलएफएस) से प्राप्त हुई है। इस स्थिति के दूरगामी प्रभाव हैं। यदि हम बारीकी से देखें, तो वर्तमान में श्रमिक अशांति और एफएमसीजी कंपनियों पर बढ़ते दबाव के पीछे यही कारण है. रिपोर्ट के अनुसार, इक्विटी निवेशक अब भारत की एफएमसीजी कंपनियों से दूर हो रहे हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि इन कंपनियों की बिक्री और मुनाफे में वृद्धि की संभावना कम है.
स्वरोजगार कर्मियों की स्थिति
पीएलएफएस के आंकड़ों के अनुसार, भारत की श्रम शक्ति में 56 प्रतिशत हिस्सा स्वरोजगार कर्मियों का है। जनवरी से दिसंबर 2025 के बीच इन कर्मियों को मिलने वाले काम के घंटों में सबसे बड़ी गिरावट देखी गई है। जुलाई 2018 से जून 2019 के बीच, इन कर्मियों को औसतन 46.6 घंटे काम मिलता था, जबकि पिछले वर्ष यह औसत घटकर 39.6 घंटे रह गया.
महिलाओं की कार्य स्थिति
गांवों में अधिकांश महिलाएं इस श्रेणी में आती हैं। उनके कामकाजी घंटे 2018-19 में 38.2 घंटों की तुलना में पिछले वर्ष 32.6 घंटे रह गए। इसके परिणामस्वरूप, शहरों की ओर पलायन बढ़ा है, जबकि वहां भी रोजगार के अवसर कम हो गए हैं. इस स्थिति में श्रमिकों की सौदेबाजी की क्षमता में कमी आई है, जिससे कंपनियां उन्हें न्यूनतम वेतन पर 12 घंटे तक काम करने के लिए मजबूर कर रही हैं.
दुश्चक्र की स्थिति
जब रोजमर्रा की आवश्यकताएं पूरी नहीं होतीं, तो ऐसे हालात बनते हैं जैसे नोएडा में देखे गए हैं। इससे मांग और उपभोग में गिरावट आती है, जो कंपनियों के मुनाफे को प्रभावित करता है। भारत में यह दुश्चक्र गंभीर होता जा रहा है.
