राजस्थान हाईकोर्ट ने आसाराम की उम्रकैद को बरकरार रखा
उम्रकैद की सजा पर हाईकोर्ट का फैसला
राजस्थान उच्च न्यायालय ने एक नाबालिग के बलात्कार से संबंधित मामले में आसाराम की उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा है। अदालत ने 2018 में ट्रायल कोर्ट द्वारा दिए गए उस निर्णय को खारिज कर दिया, जिसमें उन्हें दोषी ठहराया गया था। हालांकि, हाईकोर्ट ने सबूतों की कमी के कारण गैंगरेप और आपराधिक साजिश के आरोपों को हटा दिया है।
जोधपुर बेंच का निर्णय
यह निर्णय राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर बेंच में जस्टिस अरुण कुमार मोंगा और जस्टिस योगेंद्र कुमार पुरोहित द्वारा सुनाया गया। अदालत ने कहा कि ट्रायल के दौरान भारतीय दंड संहिता और पोक्सो एक्ट के तहत यौन उत्पीड़न के आरोप स्पष्ट रूप से साबित हुए हैं। साथ ही, आसाराम के सह-आरोपी शरतचंद्र और शिल्पी को सभी आरोपों से बरी कर दिया गया है, जबकि पहले उन्हें 20 साल की कठोर कारावास की सजा सुनाई गई थी।
मामले का इतिहास
यह मामला 2013 में शुरू हुआ, जब एक नाबालिग ने जोधपुर में आसाराम पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया। पुलिस ने विस्तृत जांच के बाद चार्जशीट दायर की। अप्रैल 2018 में, विशेष पोक्सो कोर्ट ने आसाराम को दोषी ठहराया और उन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई।
फैसले के बाद की स्थिति
हाईकोर्ट ने इस साल की शुरुआत में दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अपना फैसला सुरक्षित रखा था। आसाराम का प्रतिनिधित्व वरिष्ठ वकील देवदत्त कामत ने किया, जबकि राजस्थान सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता दीपक चौधरी ने पेशी दी। पीड़ित लड़की की ओर से वकील पीसी सोलंकी उपस्थित थे। फैसले के बाद, पीड़ित के वकील ने कहा कि आसाराम की उम्रकैद की सजा अभी भी लागू है। उन्होंने यह भी बताया कि सह-आरोपियों को बरी करने के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की जा सकती है।
वर्तमान में, आसाराम मेडिकल कारणों से अंतरिम जमानत पर बाहर हैं, और उनकी जमानत हाल ही में 7 जुलाई 2026 तक बढ़ा दी गई है। उनकी कानूनी टीम ने पिछले कुछ वर्षों में राहत पाने के लिए विभिन्न अदालतों में कई याचिकाएं दायर की हैं।
