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सुप्रीम कोर्ट ने सोशल मीडिया पर वीडियो और फोटो अपलोड करने की प्रवृत्ति पर जताई चिंता

सुप्रीम कोर्ट ने मोबाइल फोन से वीडियो और फोटो को सोशल मीडिया पर तुरंत अपलोड करने की बढ़ती प्रवृत्ति पर चिंता व्यक्त की है। अदालत ने कहा कि यह आरोपियों की निष्पक्ष सुनवाई के लिए खतरा बन सकता है। याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि पुलिस अपमानजनक तस्वीरें साझा कर रही है, जिससे व्यक्ति की गरिमा को ठेस पहुँचती है। सीजेआई सूर्यकांत ने इसे डिजिटल अरेस्ट जैसा बताया और कहा कि जांच एजेंसियों को निष्पक्ष रहना चाहिए। अदालत ने पुलिस को मीडिया ब्रीफिंग के लिए दिशा-निर्देश बनाने का आदेश दिया है।
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पुलिसकर्मियों द्वारा आरोपियों के फोटो-वीडियो अपलोड करना गंभीर चिंता का विषय

सुप्रीम कोर्ट, नई दिल्ली: सर्वोच्च न्यायालय ने मोबाइल फोन के माध्यम से मीडिया बनने और सोशल मीडिया पर तात्कालिक वीडियो अपलोड करने की बढ़ती प्रवृत्ति पर गहरी चिंता व्यक्त की है। अदालत ने कहा कि इस तरह की गतिविधियाँ आरोपियों की निष्पक्ष सुनवाई के लिए गंभीर खतरा उत्पन्न कर सकती हैं, जिससे पहले से ही आरोपियों के खिलाफ एक नकारात्मक माहौल बन जाता है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति बागची और न्यायमूर्ति विपुल पंचोली की बेंच ने शुक्रवार को एक याचिका पर सुनवाई की, जिसमें कहा गया कि पुलिस आरोपियों के वीडियो और फोटो सोशल मीडिया पर डालकर लोगों में पूर्वाग्रह पैदा कर रही है। यह याचिका हेमेंद्र पटेल द्वारा दायर की गई थी।


व्यक्ति की गरिमा को ठेस पहुंचती है

याचिकाकर्ता ने बताया कि पुलिस आरोपियों की हथकड़ी लगी, रस्सियों से बंधी या अपमानजनक स्थिति में तस्वीरें सोशल मीडिया पर साझा कर रही है। इससे व्यक्ति की गरिमा को ठेस पहुँचती है और समाज में पूर्वाग्रह उत्पन्न होता है। अदालत ने इस पर सहमति जताते हुए इसे गंभीर चिंता का विषय माना है।


हर कोई खुद को मीडिया समझने लगा है

याचिकाकर्ता ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी राज्यों को पुलिस मीडिया ब्रीफिंग के लिए दिशा-निर्देश बनाने के लिए कहा है, जिसमें सोशल मीडिया पोस्ट भी शामिल होंगे। आजकल हर मोबाइल फोन रखने वाला व्यक्ति खुद को मीडिया समझने लगा है।


यह डिजिटल अरेस्ट जैसा ट्रेंड

सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि यह स्थिति डिजिटल अरेस्ट जैसी बनती जा रही है। छोटे शहरों में लोग खुद को मीडियाकर्मी बताकर गाड़ियों पर स्टीकर लगाते हैं और इसका गलत इस्तेमाल करते हैं। सुनवाई में यह भी सामने आया कि कुछ लोग सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट के स्टीकर लगाकर टोल टैक्स से बचने की कोशिश करते हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि जांच एजेंसी का कार्य निष्पक्ष रहना चाहिए, न कि पीड़ित के पक्ष में और न ही आरोपी के पक्ष में।


सुनवाई में सहारा बनाम सेबी केस का जिक्र

सुनवाई के दौरान सहारा बनाम सेबी केस का उल्लेख किया गया, जिसमें मीडिया ट्रायल के खतरे पर सुप्रीम कोर्ट पहले ही चिंता जता चुका है। अदालत ने कहा कि आज सोशल मीडिया के कारण यह खतरा और बढ़ गया है, जिससे कानून का राज प्रभावित हो सकता है। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि सोशल मीडिया पर कुछ प्लेटफॉर्म ऐसे हैं जो ब्लैकमेलर की तरह काम करते हैं और माहौल को बिगाड़ते हैं।


अप्रैल के बाद दोबारा दायर करें याचिका

अदालत ने बताया कि पुलिस को मीडिया ब्रीफिंग के लिए एसओपी बनाने के लिए तीन महीने का समय दिया गया है। बेंच ने सुझाव दिया कि याचिका को अभी वापस लेकर अप्रैल के बाद, जब एसओपी लागू हो जाएगा, फिर से दायर किया जाए।