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अजित पवार के तेवर: भाजपा के लिए नई चुनौतियाँ

स्थानीय निकाय चुनावों के बाद, अजित पवार ने भाजपा पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए हैं, जिससे राजनीतिक माहौल गरम हो गया है। उनके बयानों ने भाजपा के नेताओं में चिंता पैदा कर दी है। पवार का आत्मविश्वास और उनके चाचा शरद पवार के साथ तालमेल ने इस स्थिति को और दिलचस्प बना दिया है। जानें, 16 जनवरी को चुनाव परिणामों के बाद की राजनीति में क्या बदलाव आ सकते हैं।
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अजित पवार के तेवर: भाजपा के लिए नई चुनौतियाँ

अजित पवार का राजनीतिक मिजाज

स्थानीय निकाय चुनावों के परिणामों के बाद, यह सवाल उठता है कि अजित पवार का अगला कदम क्या होगा। उनके हालिया बयानों ने भाजपा के नेताओं में चिंता पैदा कर दी है। पवार ने भाजपा पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाए हैं और खुद को एक ईमानदार नेता के रूप में पेश किया है। उन्होंने कहा, 'जिन लोगों ने मुझ पर 70 हजार करोड़ रुपये के भ्रष्टाचार का आरोप लगाया, वे अब मेरे साथ गठबंधन में हैं।'


पवार ने पिंपरी चिंचवाड़ नगर निगम में भ्रष्टाचार के लिए भाजपा को सीधे तौर पर जिम्मेदार ठहराया, जिससे भाजपा के लिए यह स्थिति चौंकाने वाली बन गई। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष रवींद्र चव्हाण ने पवार पर पलटवार करते हुए पूछा कि क्या वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस पर भी भ्रष्टाचार के आरोप लगा रहे हैं। यह सवाल उठता है कि पवार को यह आत्मविश्वास कहां से मिला है। क्या वे सोचते हैं कि भाजपा के साथ तालमेल या कुछ आरोपों में राहत पाने से वे सुरक्षित हो गए हैं?


पवार ने 70 हजार करोड़ रुपये के घोटाले का उल्लेख कर भाजपा के शीर्ष नेताओं को चिढ़ाया है। अमित शाह ने उन्हें जेल भेजने की बात कही थी। इस बीच, बीएमसी और 29 अन्य नगरीय निकायों के चुनाव परिणामों से ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि चुनाव के बाद का राजनीतिक परिदृश्य क्या होगा। अजित पवार के तेवर और उनके चाचा शरद पवार के साथ तालमेल ने इस स्थिति को और दिलचस्प बना दिया है। उन्होंने पुणे और पिंपरी चिंचवाड़ में शरद पवार की एनसीपी के साथ सहयोग किया है।


पूरा परिवार इस चुनाव में एकजुट होकर सामने आया है और सार्वजनिक मंच पर गौतम अडानी के साथ अपनी नजदीकी का प्रदर्शन किया है। भाजपा के आशीष सेलार ने कहा कि सावरकर के विचारों का सम्मान सभी सहयोगी पार्टियों को करना चाहिए, जबकि अजित पवार की पार्टी ने शाहू, फुले और अंबेडकर के विचारों को मानने की बात कही। ऐसे में, 16 जनवरी को चुनाव परिणामों के बाद की राजनीति और भी दिलचस्प होने वाली है।