अमेरिका में ट्रंप के खिलाफ ऐतिहासिक विरोध, 90 लाख लोग सड़कों पर
अमेरिका के सामने दोहरी चुनौती
वाशिंगटन: अमेरिका, जो दुनिया का सबसे शक्तिशाली देश माना जाता है, इस समय गंभीर संकट का सामना कर रहा है। एक ओर, पश्चिम एशिया में ईरान के साथ चल रहे संघर्ष में हजारों लोग अपनी जान गंवा चुके हैं, वहीं दूसरी ओर, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों के खिलाफ देश के भीतर जनता का गुस्सा भड़क उठा है। ट्रंप प्रशासन के खिलाफ विरोध की लहर इतनी तेज हो गई है कि अमेरिका के सभी 50 राज्यों में हाहाकार मच गया है, और लोग सड़कों पर उतरकर सत्ता परिवर्तन की मांग कर रहे हैं। यह बगावत यूरोप, लैटिन अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया तक फैल गई है।
‘नो किंग्स’ आंदोलन की बढ़ती लहर
अमेरिका में हो रहे ये प्रदर्शन सामान्य नहीं हैं, बल्कि इसे ‘नो किंग्स’ (कोई राजा नहीं) के नाम से जाना जा रहा है, जो अब तक का सबसे बड़ा विरोध माना जा रहा है। आयोजकों के अनुसार, लगभग 90 लाख लोगों ने ट्रंप के खिलाफ आवाज उठाई है। देशभर में 3,100 से अधिक विरोध प्रदर्शन आयोजित किए गए हैं। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि ये विरोध केवल बड़े शहरों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि दो-तिहाई रैलियां छोटे कस्बों और ग्रामीण क्षेत्रों में भी हो रही हैं, जो सत्ता के लिए एक बड़ा खतरा साबित हो सकता है।
मिनेसोटा: विरोध का केंद्र
इस विशाल आंदोलन का मुख्य केंद्र मिनेसोटा की राजधानी सेंट पॉल है, जहां कई हॉलीवुड सितारों ने ट्रंप सरकार के खिलाफ मोर्चा खोला है। प्रसिद्ध रॉक गायक ब्रूस स्प्रिंगस्टीन ने इमिग्रेशन एजेंटों की गोलीबारी में मारे गए लोगों की याद में अपना नया गाना ‘स्ट्रीट्स ऑफ मिनियापोलिस’ गाकर लोगों में जोश भर दिया। इस ऐतिहासिक विरोध में अभिनेता रॉबर्ट डी नीरो, गायिका जोन बेज, अभिनेत्री जेन फोंडा और सीनेटर बर्नी सैंडर्स जैसे बड़े नाम शामिल हुए।
जनता के आक्रोश के पीछे के कारण
इस भारी जन आक्रोश के पीछे कई महत्वपूर्ण मुद्दे हैं। सबसे बड़ा मुद्दा ट्रंप प्रशासन का इमिग्रेशन अभियान है, जिसने कई राज्यों में लोगों में डर पैदा कर दिया है। इसके अलावा, ईरान के साथ युद्ध, ट्रांसजेंडर अधिकारों में कटौती और अमीरों का बढ़ता दबदबा भी इस आक्रोश को बढ़ा रहा है। वाशिंगटन में लोग ‘ताज उतारो, जोकर’ और ‘बदलाव यहीं से शुरू होता है’ जैसे नारों के साथ सड़कों पर उतरे हैं। न्यूयॉर्क से लेकर सैन डिएगो तक, हर जगह ट्रंप के खिलाफ विरोध देखा जा रहा है।
वैश्विक स्तर पर गूंजती आवाज
यह गुस्सा केवल अमेरिका तक सीमित नहीं है, बल्कि रोम, लंदन और पेरिस जैसे शहरों में भी भारी भीड़ ने अमेरिका-इजरायल के हमलों और नस्लवाद के खिलाफ मार्च निकाला। जिन देशों में राजशाही है, वहां इस आंदोलन को ‘नो टायरेंट्स’ (कोई तानाशाह नहीं) का नाम दिया गया है। व्हाइट हाउस इस बगावत पर बौखलाया हुआ है, और राष्ट्रपति ट्रंप की प्रवक्ता ने इसे ‘वामपंथी फंडिंग का खेल’ करार दिया है। हालांकि, इडाहो जैसे राज्यों में भी भारी भीड़ का उमड़ना यह दर्शाता है कि वास्तविकता व्हाइट हाउस के दावों से बहुत दूर है।
