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असम चुनाव: भाजपा की चिंताएँ और रणनीतियाँ

असम में भाजपा की चुनावी स्थिति पर चर्चा करते हुए, यह स्पष्ट होता है कि पार्टी को मुस्लिम और अहोम वोटों के एकजुट होने की चिंता है। परिसीमन के बाद मुस्लिम बहुल सीटों की संख्या में कमी आई है, फिर भी भाजपा अपनी जीत को लेकर आश्वस्त नहीं है। गौरव गोगोई जैसे नेताओं के प्रभाव और अहोम समुदाय की चिंताओं को देखते हुए, भाजपा को अपनी रणनीतियों पर ध्यान केंद्रित करना होगा। क्या भाजपा अकेले दम पर बहुमत हासिल कर पाएगी? जानें इस लेख में।
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असम चुनाव: भाजपा की चिंताएँ और रणनीतियाँ

भाजपा की चुनावी स्थिति

क्या असम में भाजपा को किसी प्रकार की चिंता महसूस हो रही है? सामान्यतः ऐसा नहीं होना चाहिए, क्योंकि परिसीमन के बाद मुस्लिम बहुल सीटों की संख्या 39 से घटकर 22 रह गई है। इन 22 सीटों पर कांग्रेस और बदरूद्दीन अजमल की पार्टी के बीच तीव्र प्रतिस्पर्धा चल रही है। असदुद्दीन ओवैसी भी अजमल की पार्टी के समर्थन में सक्रिय हो गए हैं। राज्य की शेष 104 सीटों पर भाजपा के लिए जीत हासिल करना अपेक्षाकृत आसान माना जा रहा है। फिर भी, भाजपा की मेहनत और उठाए जा रहे मुद्दे यह दर्शाते हैं कि पार्टी जीत के बड़े दावों के बावजूद पूरी तरह से आश्वस्त नहीं है। यही कारण है कि नरेंद्र मोदी, अमित शाह और हिमंत बिस्वा सरमा जैसे नेता घुसपैठ और अन्य भावनात्मक मुद्दों पर अधिक ध्यान केंद्रित कर रहे हैं।


वास्तव में, भाजपा को इस बात की चिंता है कि अहोम वोट कहीं कांग्रेस की ओर न झुक जाए। गौरव गोगोई, जो अहोम समुदाय से हैं, लगभग 10 प्रतिशत वोटों का प्रतिनिधित्व करते हैं। अहोम लोग मानते हैं कि उनकी भाषा और संस्कृति खतरे में है, और भाजपा उनकी रक्षा करने में असफल रही है। बांग्ला भाषी असमिया लोगों का समर्थन भाजपा को प्राप्त है, लेकिन असमिया भाषी लोगों का समर्थन उसी अनुपात में नहीं है। यही कारण है कि गौरव गोगोई पर हमले कम हुए हैं। यदि मुसलमानों ने अहोम समुदाय के साथ मिलकर रणनीतिक रूप से वोट दिया, तो भाजपा को बड़ा झटका लग सकता है। ध्यान रहे कि भाजपा इस बार अकेले दम पर बहुमत का आंकड़ा, यानी 64 सीटें, हासिल करने का लक्ष्य रखती है।