ईरान-इजरायल संघर्ष के बीच अमेरिकी नौसेना की गतिविधियाँ: क्या है सच्चाई?
मिडिल ईस्ट में ईरान और इजरायल के बीच चल रहे संघर्ष के बीच अमेरिकी नौसेना के जहाजों की गतिविधियाँ चर्चा का विषय बन गई हैं। यूएसएस तुलसा और यूएसएस सा बरबरा की मलेशिया में उपस्थिति ने सुरक्षा चिंताओं को बढ़ा दिया है। क्या अमेरिका अपनी सैन्य शक्ति को मिडिल ईस्ट से हटाकर इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में स्थानांतरित कर रहा है? जानें इस स्थिति के पीछे की रणनीति और संभावित परिणाम।
| Mar 18, 2026, 12:03 IST
मिडिल ईस्ट में अमेरिकी नौसेना की हलचल
मिडिल ईस्ट में ईरान और इजरायल के बीच चल रहे संघर्ष के बीच एक नई सैन्य गतिविधि ने वैश्विक रक्षा विशेषज्ञों को चौंका दिया है। अमेरिकी नौसेना के अत्याधुनिक माइन काउंटर मेजर जहाज, यूएसएस तुलसा और यूएसएस सा बरबरा, अचानक अपने बेस बहरीन से 3500 मील दूर मलेशिया के पेनांग में देखे गए हैं। यह घटनाक्रम उस समय सामने आया है जब हुर्म जलडमरू क्षेत्र में समुद्री बारूदी सुरंगों का खतरा बढ़ गया है। इन जहाजों का मुख्य कार्य समुद्र में बारूदी सुरंगों का पता लगाना और उन्हें नष्ट करना है, ताकि तेल के टैंकर और मालवाहक जहाज सुरक्षित रह सकें। ऐसे में इनका युद्ध क्षेत्र से इतनी दूर जाना अमेरिका की सैन्य रणनीति और सुरक्षा चिंताओं पर सवाल उठाता है। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका ने इन महत्वपूर्ण जहाजों को ईरान की संभावित जवाबी कार्रवाई से बचाने के लिए जानबूझकर एक क्षेत्र से बाहर निकाला है।
ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव
फरवरी 2026 में ईरान और अमेरिका के बीच शुरू हुई सैन्य झड़पों के बाद, बहरीन में अमेरिकी फिफ्थ फ्लोट का मुख्यालय ईरान की बैलेस्टिक मिसाइलों और कामिकाजे ड्रोन की सीधी रेंज में आ गया है। विशेषज्ञों का कहना है कि इंडिपेंडेंस क्लास के ये जहाज एल्यूमिनियम से बने हैं। हालांकि तकनीकी दृष्टि से ये अद्वितीय हैं, लेकिन संरचनात्मक रूप से ये पुराने लकड़ी के माइन वेपर्स की तुलना में अधिक नाजुक हैं। यदि ईरान इन पर हमला करता है, तो इनके डूबने या गंभीर नुकसान का खतरा बढ़ जाता है। अमेरिका संभवतः अपने महंगे युद्धपोतों को सॉफ्ट टारगेट बनने से बचाना चाहता है। यूएसएस तुलसा और यूएसएस सा बरबरा की मलेशिया में उपस्थिति यह दर्शाती है कि अमेरिका फिलहाल मिडिल ईस्ट के समुद्री रास्तों की सुरक्षा को लेकर बैकफुट पर है।
मिडिल ईस्ट में सुरक्षा की चुनौतियाँ
यदि ईरान ने इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग में बारूदी सुरंगें बिछा दीं, तो इन्हें हटाने की जिम्मेदारी इन जहाजों की थी। इनकी अनुपस्थिति से अब तेल के टैंकरों और अन्य व्यापारिक जहाजों के लिए खतरा बढ़ गया है। अमेरिकी नौसेना ने इसे केवल एक लॉजिस्टिक स्टॉप बताया है, लेकिन 3500 मील की यह दूरी केवल रसद आपूर्ति के तर्क से मेल नहीं खाती। एक और पहलू यह है कि अमेरिका अपनी सैन्य शक्ति का केंद्र धीरे-धीरे मिडिल ईस्ट से इंडो-पैसिफिक क्षेत्र की ओर स्थानांतरित कर रहा है। चीन के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए इन जहाजों की मलेशिया में उपस्थिति को एक नए सैन्य तालमेल के रूप में देखा जा रहा है। लेकिन सवाल यह है कि क्या इस बदलाव की कीमत मिडिल ईस्ट में असुरक्षित होते समुद्री मार्ग होंगे। वर्तमान में मिडिल ईस्ट में केवल एक माइन हंटर जहाज, यूएस कैनबरा, तैनात है। अकेले एक जहाज के भरोसे दुनिया के सबसे खतरनाक समुद्री रास्ते को सुरक्षित रखना असंभव है।
सहयोगी देशों की चिंताएँ
इस स्थिति ने सहयोगी देशों, विशेषकर खाड़ी देशों और इजराइल के बीच चिंता पैदा कर दी है, जो समुद्र में अमेरिकी सुरक्षा पर निर्भर हैं। आने वाले दिनों में यह देखना होगा कि क्या अमेरिका इन जहाजों को वापस मिडिल ईस्ट भेजता है या जापान में तैनात अपने अन्य माइनपर्स को इस कमी को पूरा करने के लिए बुलाता है। फिलहाल मलेशिया के तट पर खड़े ये जहाज वाशिंगटन की रक्षात्मक मुद्रा को दर्शाते हैं। ईरान की सुप्रीम सिक्योरिटी काउंसिल के प्रमुख अली लारीजानी ने कहा है कि अमेरिका और इजराइल के बीच संबंधों पर सवाल उठते हैं, और मुसलमानों को अपने भविष्य का निर्धारण करना होगा।
