Newzfatafatlogo

ईरान में क्रांति के बीच फांसी की सजा: खामनेई का नया कदम

ईरान में खामनेई ने क्रांति के समर्थकों के खिलाफ फांसी की सजा देने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। इरफान सुल्तानी को मोहरीब कानून के तहत फांसी दी जा रही है, जिसके कारण एक नई बगावत की संभावना बढ़ गई है। उनके परिवार को सुनवाई के दौरान उचित कानूनी सहायता नहीं मिली। इस कदम से खलीफा के खिलाफ जनता में गुस्सा भड़क सकता है। क्या यह कदम खलीफा के तख्तापलट की दिशा में एक निर्णायक मोड़ साबित होगा? जानें इस मामले की पूरी जानकारी।
 | 
ईरान में क्रांति के बीच फांसी की सजा: खामनेई का नया कदम

ईरान में फांसी की सजा का नया अध्याय

ईरान के सर्वोच्च नेता खामनेई ने क्रांति के समर्थकों के खिलाफ फांसी की सजा देने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। आज, 14 जनवरी को, इस क्रांति के दौरान पहली फांसी का निर्णय लिया गया है। यह कदम ईरानी जनता को डराने की एक अंतिम कोशिश मानी जा रही है। लेकिन क्या यह कदम खलीफा के तख्तापलट की दिशा में एक निर्णायक कदम साबित होगा? खलीफा की कट्टरपंथी सेना ने इरफान सुल्तानी को 8 जनवरी को गिरफ्तार किया था। तीन दिन के भीतर उन पर आरोप तय कर दिए गए और उन्हें कल फांसी दी जाएगी। इरफान को जिस तरह से सजा दी जा रही है, उससे खलीफा के खिलाफ एक नई बगावत की संभावना बढ़ सकती है।


इरफान सुल्तानी को मोहरीब कानून के तहत फांसी दी जा रही है। उन्हें 8 जनवरी को गिरफ्तार किया गया था, और उनके परिवार को यह भी नहीं बताया गया कि उन्हें किस एजेंसी ने पकड़ा। सुनवाई के बाद, उन्हें 11 जनवरी को मौत की सजा सुनाई गई। यह भी दावा किया जा रहा है कि उन्हें वकील नहीं दिया गया और सुनवाई के दौरान अपनी बात रखने का मौका नहीं मिला।


परिवार से मिलने का मौका

सुनवाई के बाद, इरफान के परिवार को केवल 10 मिनट के लिए उनसे मिलने की अनुमति दी गई। परिवार को बताया गया कि सजा अंतिम है और इसे समय पर लागू किया जाएगा। इरफान की बहन एक मान्यता प्राप्त वकील हैं, फिर भी उन्हें अपने भाई के केस की फाइल देखने या पैरवी करने की अनुमति नहीं दी गई। यह भी कहा जा रहा है कि इरफान को सार्वजनिक रूप से फांसी दी जा सकती है, जिससे खलीफा प्रदर्शनकारियों में डर पैदा करना चाहते हैं। लेकिन यह भी माना जा रहा है कि इस तरह की जल्दबाजी से ईरानी जनता में खलीफा के खिलाफ और अधिक गुस्सा भड़क सकता है।


ऐसे मामलों में, इतिहास यह दर्शाता है कि इस तरह की फांसी जनता को डराने के बजाय और भड़काती है।


इतिहास की पुनरावृत्ति

1970 के दशक में ईरान में शाह मोहम्मद रेजा पहलवी की तानाशाही अपने चरम पर थी। 1978 में, तानाशाही विरोधियों को दबाने के लिए शाह ने अपने सुरक्षा बलों को खुली छूट दे दी थी। 8 सितंबर 1978 को तेहरान के जलते स्कॉर पर सुरक्षा बलों ने सैकड़ों प्रदर्शनकारियों पर गोलियां चलाईं। इस दिन को ब्लैक फ्राइडे के नाम से जाना जाता है। इस नरसंहार ने ईरानी जनता को इतना भड़काया कि इसके 156 दिन बाद, 11 फरवरी 1979 को शाह का तख्ता पलट हो गया।