उत्तर प्रदेश चुनाव से पहले भाजपा की बेचैनी बढ़ी
भाजपा की बढ़ती चिंताएं
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में एक साल का समय बचा है, और इस दौरान कई घटनाएं ऐसी हुई हैं, जिन्होंने भारतीय जनता पार्टी की चिंता को बढ़ा दिया है। इसका एक संकेत यह है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत लगातार उत्तर प्रदेश में सक्रिय हैं। उन्होंने गोरखपुर में तीन दिन बिताए, फिर लखनऊ में तीन दिन रहे और अंत में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मेरठ में ठहरे। लखनऊ में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने उनसे मुलाकात की, जो लगभग आधे घंटे चली।
उपमुख्यमंत्रियों की मुलाकातें
इसके बाद, दोनों उपमुख्यमंत्रियों ने भी उनसे बारी-बारी से मुलाकात की। पहले केशव प्रसाद मौर्य मिले और फिर ब्रजेश पाठक ने उनसे बातचीत की। इस मुलाकात के अगले दिन, ब्रजेश पाठक ने ब्राह्मण बटुकों को अपने घर बुलाकर उनका सम्मान किया। इसके साथ ही, उन्होंने माघ मेले में प्रयागराज में वेदपाठी बटुकों के साथ हुई मारपीट के मामले में सख्त कार्रवाई की मांग की।
भाजपा के लिए चुनौतीपूर्ण घटनाक्रम
पिछले दो महीनों में दो महत्वपूर्ण घटनाएं हुई हैं, जिन्होंने भाजपा के पूरे तंत्र में बेचैनी पैदा की है। पहले, माघ मेले में ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की पालकी रोकी गई और उनके अनुयायियों पर हमला हुआ। इसके बाद, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने उच्च शिक्षा संस्थानों में भेदभाव रोकने के लिए नई नियमावली जारी की, जो सामान्य जातियों को अपराधी और उत्पीड़क के रूप में दर्शाती थी। यह इतना भेदभावकारी था कि सुप्रीम कोर्ट को भी इस पर टिप्पणी करनी पड़ी।
सामाजिक विद्वेष और राजनीतिक प्रतिक्रिया
इससे सामाजिक विद्वेष फैल गया, और अगड़ी जातियों ने भाजपा के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। कई स्थानों पर प्रदर्शन हुए, और सामान्य जातियों ने भाजपा को सबक सिखाने का ऐलान किया। मायावती और अखिलेश यादव ने भी ब्राह्मणों के सम्मान की बात की है।
भाजपा की रणनीति
भाजपा को उत्तर प्रदेश में राजपूतों की चिंता नहीं है, क्योंकि योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री हैं। कायस्थों की संख्या कम है, लेकिन ब्राह्मणों और भूमिहारों की चिंता बढ़ गई है। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय राय भूमिहारों को भाजपा के खिलाफ एकजुट कर रहे हैं, जबकि ब्राह्मण योगी राज में अनदेखी से नाराज हैं। इस स्थिति को देखते हुए भाजपा और संघ दोनों डैमेज कंट्रोल में जुटे हैं।
ब्रजेश पाठक की भूमिका
ऐसा प्रतीत होता है कि ब्रजेश पाठक को ब्राह्मणों के हितैषी के रूप में सामने लाने की जिम्मेदारी दी गई है। पहले केशव प्रसाद मौर्य ने शंकराचार्य से अपील की थी, लेकिन जब वह सफल नहीं हुए, तो ब्रजेश पाठक को आगे लाया गया। भाजपा अब खुद को पक्ष और विपक्ष दोनों की भूमिका में दिखा रही है।
