केरल में भाजपा का नया राजनीतिक अध्याय: अमित शाह का नेतृत्व और चुनावी रणनीतियाँ
भाजपा की केरल में नई रणनीति
नई दिल्ली: भाजपा ने दक्षिण भारत के केरल को अपनी राजनीतिक प्रयोगशाला के रूप में विकसित करने का निर्णय लिया है, जो लंबे समय से वामपंथियों का गढ़ रहा है। पार्टी विधानसभा चुनावों में महत्वपूर्ण बढ़त हासिल करने की योजना बना रही है, जिसका नेतृत्व केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह कर रहे हैं।
हाल ही में हुए स्थानीय निकाय चुनावों में मिली सफलता ने भाजपा के आत्मविश्वास को बढ़ाया है। तिरुवनंतपुरम में मिली जीत को पार्टी एक नए राजनीतिक युग की शुरुआत मानती है। इसी उत्साह के साथ अमित शाह ने कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए कहा, "जो कभी नहीं बदला है, वह अब बदलेगा।"
अमित शाह का केरल दौरा
अमित शाह ने अपने केरल दौरे के दौरान पार्टी कार्यकर्ताओं में नई ऊर्जा भरने का प्रयास किया। उन्होंने मणिपुर और त्रिपुरा जैसे राज्यों का उदाहरण देते हुए बताया कि जहां भाजपा पहले हाशिए पर थी, वहां अब उसकी सरकारें हैं। उन्होंने 1984 का भी जिक्र किया, जब भाजपा के पास केवल दो सांसद थे, और अब पार्टी लगातार तीसरी बार केंद्र में सत्ता में है।
भाजपा के लिए वामपंथी सरकार के खिलाफ बढ़ते असंतोष को एक अवसर के रूप में देखा जा रहा है, और पार्टी विकास के एजेंडे के साथ जनता तक पहुंचने की योजना बना रही है।
स्थानीय चुनावों से मिली नई ऊर्जा
हाल के स्थानीय निकाय चुनावों ने भाजपा को नई ऊर्जा प्रदान की है। तिरुवनंतपुरम नगर निगम में 101 में से 50 वार्ड जीतकर भाजपा ने इतिहास रच दिया और पहली बार केरल में भाजपा का मेयर बना। सभी छह नगर निगमों में एनडीए को 23 फीसदी से अधिक वोट शेयर मिला, जो शहरी मतदाताओं में पार्टी की बढ़ती स्वीकार्यता को दर्शाता है।
एनडीए का बढ़ता वोट शेयर
भाजपा का आत्मविश्वास केवल नारों पर नहीं, बल्कि आंकड़ों पर भी आधारित है। केरल में एनडीए का वोट शेयर लगातार बढ़ रहा है। 2001 में भाजपा का वोट शेयर लगभग 3 फीसदी था, जो 2016 और 2021 के बीच 12 से 15 फीसदी तक पहुंच गया।
लोकसभा चुनावों में 2014 में भाजपा को 12 फीसदी, 2019 में 16 फीसदी और 2024 में लगभग 20 फीसदी वोट मिले, जिससे उसे एक सीट भी प्राप्त हुई। हालांकि, यह बढ़त विधानसभा सीटों में पूरी तरह से नहीं दिखी है, लेकिन पार्टी इसे भविष्य की नींव मानती है।
गांवों में भी बढ़ती पकड़
भाजपा केवल शहरी क्षेत्रों तक सीमित नहीं रहना चाहती। हालिया निकाय चुनावों में पार्टी 79 ग्राम पंचायतों में दूसरे स्थान पर रही, जो दर्शाता है कि गांवों में भी उसका आधार धीरे-धीरे बढ़ रहा है। यह पार्टी के लिए एक रणनीतिक संकेत है।
सामाजिक मुद्दों पर ध्यान
भाजपा विकास के साथ-साथ सामाजिक और भावनात्मक मुद्दों पर भी ध्यान दे रही है। सबरीमाला मुद्दा पार्टी के लिए एक ऐसा विषय बन गया है, जिसने खासकर दक्षिणी केरल में हिंदू मतदाताओं के एक वर्ग के साथ स्थायी रिश्ता बनाने में मदद की है।
इझवा ओबीसी समुदाय के कुछ हिस्सों में भी पार्टी के प्रति झुकाव बढ़ा है। यह समुदाय हिंदू आबादी का लगभग 26 फीसदी है और पारंपरिक रूप से वामपंथी दलों का समर्थक माना जाता रहा है।
ओबीसी नेतृत्व से मजबूती
भाजपा के कई प्रमुख नेता जैसे के. सुरेंद्रन, वी. मुरलीधरन और शोभा सुरेंद्रन इसी ओबीसी समुदाय से आते हैं। पार्टी को उम्मीद है कि यह सामाजिक समीकरण आगामी विधानसभा चुनावों में उसे बड़ा लाभ दिला सकता है।
