क्या बदलने जा रहा है JEE और NEET की तैयारी का तरीका? जानें नई समिति की सिफारिशें
शिक्षा प्रणाली में बदलाव की दिशा में कदम
भारत में इंजीनियरिंग और मेडिकल प्रवेश परीक्षाओं की तैयारी अब तक कोचिंग संस्थानों पर निर्भर रही है, जिससे डमी स्कूलों का प्रचलन बढ़ा है। इस स्थिति ने छात्रों पर मानसिक दबाव डाला है और स्कूल शिक्षा की भूमिका को कमजोर किया है। अब, केंद्र सरकार इस प्रणाली में महत्वपूर्ण बदलाव लाने की योजना बना रही है। शिक्षा मंत्रालय द्वारा गठित एक उच्चस्तरीय समिति ने JEE मेन और NEET UG जैसी परीक्षाओं के संचालन, स्कूल शिक्षा प्रणाली और कोचिंग संस्कृति पर गहन विचार-विमर्श किया है। समिति का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि छात्र स्कूल में पढ़ाई करते हुए प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर सकें, न कि केवल कोचिंग पर निर्भर रहें।
समिति की संरचना और बैठकें
उच्च शिक्षा विभाग के सचिव विनीत जोशी की अध्यक्षता में यह समिति जून 2025 में गठित की गई थी। इसमें सीबीएसई, एनटीए, आईआईटी और एनआईटी के वरिष्ठ शिक्षाविद शामिल हैं। समिति की दो महत्वपूर्ण बैठकें अगस्त और नवंबर में आयोजित की गईं, जिनमें स्कूल शिक्षा की कमियों, प्रवेश परीक्षाओं की निष्पक्षता, डमी स्कूलों और कोचिंग के बढ़ते प्रभाव पर चर्चा की गई।
कोचिंग संस्कृति का समाधान
समिति का स्पष्ट मानना है कि कोचिंग संस्कृति का उदय कुछ कारणों से हुआ है और इसका समाधान स्कूल प्रणाली को मजबूत किए बिना संभव नहीं है। इसके अलावा, छात्रों के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए, समिति ने सुझाव दिया है कि कोचिंग क्लास को रोजाना अधिकतम 2 से 3 घंटे तक सीमित किया जाए। साथ ही, कम उम्र में कोचिंग जॉइन करने की प्रवृत्ति पर भी चिंता व्यक्त की गई है।
स्कूल सिलेबस और प्रवेश परीक्षा के बीच का अंतर
समिति ने यह पाया कि स्कूलों में पढ़ाया जाने वाला पाठ्यक्रम और JEE-NEET जैसी परीक्षाओं की आवश्यकताएँ एक-दूसरे से मेल नहीं खातीं। कक्षा 10 से 11 में जाते ही छात्रों पर अचानक भारी दबाव आ जाता है। बोर्ड परीक्षाएं जहां विश्लेषणात्मक और वर्णनात्मक सोच पर आधारित होती हैं, वहीं प्रवेश परीक्षाएं पूरी तरह MCQ पैटर्न पर निर्भर करती हैं। यही अंतर छात्रों को कोचिंग की ओर धकेलता है और डमी स्कूलों को बढ़ावा देता है।
शिक्षकों की कमी और कोचिंग का प्रभाव
रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि कई स्कूलों में ऐसे शिक्षक नहीं हैं जो बोर्ड से आगे की तैयारी करवा सकें। इसके विपरीत, कोचिंग संस्थान इंजीनियर और मेडिकल ग्रेजुएट्स को पढ़ाने के लिए नियुक्त करते हैं, जो टार्गेट आधारित तैयारी कराते हैं। इसके अलावा, स्कूलों में नियमित टेस्ट, प्रदर्शन विश्लेषण और विशेष अध्ययन सामग्री जैसी सुविधाएं सीमित हैं, जबकि कोचिंग संस्थान यही सब उपलब्ध कराते हैं।
समिति के प्रमुख सुझाव
समिति ने कई महत्वपूर्ण सिफारिशें की हैं, जिनमें शामिल हैं:
- स्कूल सिलेबस और प्रवेश परीक्षाओं में तालमेल के लिए एक नोडल एजेंसी का गठन
- बोर्ड परीक्षा के अंकों को कॉलेज प्रवेश में अधिक महत्व देना
- JEE, NEET और CUET जैसी परीक्षाएं साल में एक से अधिक बार आयोजित करना
- कक्षा 11 से ही प्रतियोगी परीक्षाओं की संभावनाएं तलाशना
- CBSE स्कूलों में समस्या समाधान और मेंटरिंग क्लास शुरू करना
- MCQ और वर्णनात्मक प्रश्नों का मिश्रित मूल्यांकन मॉडल
- शिक्षकों के प्रशिक्षण पर विशेष जोर देना
कक्षा 8 से करियर काउंसलिंग की योजना
समिति ने सुझाव दिया है कि NCERT और CBSE मिलकर कक्षा 8 से करियर गाइडेंस शुरू करें। इसके लिए एक राष्ट्रीय करियर और एप्टीट्यूड पोर्टल बनाने का भी प्रस्ताव है, जिससे छात्रों और अभिभावकों को लगातार मार्गदर्शन मिल सके।
