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घुसपैठ: भाजपा का नया राजनीतिक एजेंडा

भाजपा ने घुसपैठ को एक नया राजनीतिक मुद्दा बना लिया है, जो आगामी चुनावों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। अयोध्या में राममंदिर का निर्माण और अनुच्छेद 370 का हटना जैसे मुद्दों के बाद, भाजपा अब घुसपैठ पर ध्यान केंद्रित कर रही है। जानें कि कैसे यह मुद्दा चुनावी रणनीति में शामिल हो रहा है और इसके पीछे की राजनीतिक सोच क्या है। क्या सरकार वास्तव में इस समस्या का समाधान चाहती है या केवल राजनीतिक लाभ उठाने की कोशिश कर रही है? इस लेख में इन सवालों का विश्लेषण किया गया है।
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घुसपैठ: भाजपा का नया राजनीतिक एजेंडा

घुसपैठ का मुद्दा और भाजपा का नया दृष्टिकोण

अयोध्या में राममंदिर का निर्माण, समान नागरिक संहिता का कार्यान्वयन और जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 का हटना, राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ और भारतीय जनसंघ के लिए लंबे समय से प्राथमिकता वाले मुद्दे रहे हैं। आजादी के बाद से इन पर चर्चा होती रही है और विभिन्न समय पर आंदोलन भी हुए। इनमें से दो मुद्दे अब सुलझ चुके हैं: अयोध्या में भव्य राममंदिर का निर्माण हो चुका है और अनुच्छेद 370 को समाप्त कर दिया गया है। अब समान नागरिक संहिता की शुरुआत हो चुकी है, जिसमें उत्तराखंड पहला राज्य बना है। गुजरात और असम जैसे अन्य राज्यों में भी इसे लागू करने की योजना है।


भाजपा का नया एजेंडा: घुसपैठ

भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व चाहता है कि समान नागरिक संहिता को राज्यों में लागू किया जाए। अब सवाल यह है कि इन तीन मुद्दों के समाधान के बाद भाजपा का अगला कदम क्या होगा? हिंदू राष्ट्र का निर्माण एक निरंतर विषय है, लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि भाजपा और संघ का नया फोकस घुसपैठ पर है। यह मुद्दा अब हर चुनाव में उठाया जाएगा और इसके समाधान के लिए वोट मांगे जाएंगे। कांग्रेस को घुसपैठ की समस्या के लिए जिम्मेदार ठहराया जाएगा, और इसमें हिंदू-मुस्लिम का अंतर्निहित मुद्दा भी शामिल होगा।


प्रधानमंत्री का दृष्टिकोण

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले से 11 बार भाषण दिए, लेकिन घुसपैठ का जिक्र उनके 12वें भाषण में हुआ। यह दर्शाता है कि अनुच्छेद 370, यूसीसी और राममंदिर के बाद भाजपा को एक नए मुद्दे की तलाश थी, जो घुसपैठ पर केंद्रित है। हालांकि, झारखंड में भाजपा ने इस मुद्दे को आजमाया था, लेकिन सफलता नहीं मिली। भाजपा जानती है कि पुराने मुद्दे कितने समय तक चले थे और अब वह घुसपैठ को प्रमुखता से उठाने की कोशिश कर रही है।


घुसपैठ की समस्या का समाधान

झारखंड के बाद, बिहार, असम और पश्चिम बंगाल में घुसपैठ के मुद्दे को उठाया जाएगा। प्रधानमंत्री ने एक उच्च अधिकार प्राप्त डेमोग्राफी कमीशन बनाने की घोषणा की है, जो घुसपैठ की समस्या का आकलन करेगा। यह समस्या आजादी के बाद से ही भारत में मौजूद है। 1971 की लड़ाई भी इसी मुद्दे पर आधारित थी। भाजपा हर चुनाव में इसे उठाती रही है, लेकिन अब इसे मुख्य मुद्दे के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया जा रहा है।


सरकार की गंभीरता पर सवाल

अब सवाल यह है कि क्या सरकार घुसपैठ की समस्या को केवल राजनीतिक मुद्दे के रूप में देख रही है या वास्तव में इसका समाधान करना चाहती है? पिछले 11 वर्षों से भाजपा केंद्र में है, लेकिन घुसपैठ रोकने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए हैं। गृह मंत्री अमित शाह ने सीमावर्ती जिलों के अधिकारियों को सचेत किया है, लेकिन घुसपैठ की समस्या जस की तस बनी हुई है।


घुसपैठियों की पहचान और कार्रवाई

दिल्ली और एनसीआर में अवैध घुसपैठियों की धरपकड़ हो रही है, लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि पकड़े गए लोग बांग्लादेश के हैं या पश्चिम बंगाल के। अमेरिका ने अवैध प्रवासियों को व्यवस्थित तरीके से वापस भेजने का उदाहरण पेश किया है। भारत को भी इसी तरह की योजना बनानी चाहिए। झारखंड में आरोप लगे हैं कि घुसपैठियों को नागरिकता दी जा रही है, जबकि असम में नियम बनाए गए हैं कि अंतरधार्मिक भूमि खरीदने के लिए पुलिस की मंजूरी लेनी होगी।


भाजपा का राजनीतिक लाभ

भाजपा के लिए घुसपैठ एक बड़ा मुद्दा है, लेकिन इसे सुलझाने से पहले राजनीतिक लाभ लेने की सोच दिखाई दे रही है।