डीएमके और कांग्रेस के बीच सीटों का मोलभाव: चुनावी रणनीतियाँ
डीएमके का चुनावी परिदृश्य
कांग्रेस पार्टी के नेताओं ने डीएमके पर काफी दबाव डाला है। कांग्रेस के साथ अन्य राजनीतिक दल भी चाह रहे थे कि डीएमके उनके लिए अधिक सीटें छोड़े और चुनाव जीतने के बाद सरकार में शामिल हो। वर्तमान में, डीएमके के पास अकेले बहुमत है और उसने किसी अन्य सहयोगी पार्टी को सरकार में शामिल नहीं किया है। इस बार, डीएमके ने 175 सीटों पर चुनाव लड़ने की योजना बनाई है, जबकि अन्य एक दर्जन पार्टियों के लिए उसने 59 सीटें आरक्षित की हैं। मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने चुनाव से पहले कुछ नई पार्टियों को सरकार में शामिल किया है, जिनमें कमल हसन की पार्टी भी शामिल है।
डीएमडीके का अलायंस में शामिल होना
स्टालिन ने डीएमडीके को सेकुलर प्रोग्रेसिव अलायंस का हिस्सा बना लिया है। उन्होंने पार्टी के संस्थापक कैप्टेन विजयकांत की पत्नी प्रेमलता विजयकांत से विस्तृत बातचीत के बाद उन्हें अलायंस में शामिल किया। खबरें हैं कि स्टालिन उनके लिए राज्यसभा की एक सीट आरक्षित कर रहे हैं। उल्लेखनीय है कि उन्होंने कमल हसन को भी राज्यसभा भेजा है। डीएमडीके एक महत्वपूर्ण पार्टी रही है, जिसने एक समय 27 सीटें जीती थीं। हालांकि, विजयकांत के न रहने के बाद पार्टी कमजोर हुई है, लेकिन इसका सामाजिक आधार अभी भी मजबूत है। यह स्पष्ट नहीं है कि स्टालिन ने प्रेमलता विजयकांत से विधानसभा सीटों के बारे में क्या चर्चा की है। लेकिन यह निश्चित है कि जो भी विधानसभा सीटें कमल हसन और प्रेमलता की पार्टी को मिलेंगी, वे स्टालिन की पार्टी के कोटे से दी जाएंगी। इसका अर्थ है कि उनकी सीटें कम हो सकती हैं। हालांकि, डीएमके के अलायंस में शामिल होने से कांग्रेस और अन्य पार्टियों की मोलभाव करने की क्षमता कम हो जाएगी। स्टालिन अब उन्हें अधिक सीटें नहीं देंगे। पुराने फॉर्मूले के अनुसार सभी पार्टियों को सीटें मिलेंगी। हालांकि, यह संभव है कि चुनाव के बाद डीएमके की निर्भरता अन्य पार्टियों पर बढ़ जाए।
