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डीएमके-कांग्रेस गठबंधन टूटने से बीजेपी को मिल सकते हैं नए अवसर

डीएमके और कांग्रेस के बीच बढ़ती दूरियों का असर केवल तमिलनाडु तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह देश की राजनीति पर भी गहरा प्रभाव डाल सकता है। कांग्रेस के साथ अपने गठबंधन को तोड़ने के बाद, डीएमके बीजेपी के करीब आ सकती है, जिससे बीजेपी को राज्यसभा में बहुमत हासिल करने में मदद मिल सकती है। जानें इस राजनीतिक बदलाव के पीछे के कारण और संभावित चुनौतियों के बारे में।
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डीएमके-कांग्रेस गठबंधन टूटने से बीजेपी को मिल सकते हैं नए अवसर

डीएमके और कांग्रेस के बीच बढ़ती दूरियां


डीएमके और कांग्रेस के बीच संबंधों में खटास केवल तमिलनाडु तक सीमित नहीं रहने वाली है। इसके प्रभाव देश की राजनीति पर भी पड़ने की संभावना है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस के लिए यह संकट बीजेपी के लिए एक अवसर में बदल सकता है। यदि डीएमके कांग्रेस से अलग होती है, तो यह बीजेपी के लिए एक रणनीतिक लाभ हो सकता है, जिससे वह राज्यसभा में बहुमत हासिल करने की दिशा में आगे बढ़ सकती है।


डीएमके-कांग्रेस गठबंधन का टूटना

केंद्र में सत्तारूढ़ बीजेपी ने डीएमके और कांग्रेस के बीच गठबंधन टूटने के बाद नए अवसरों की तलाश शुरू कर दी है। डीएमके के सहयोग से बीजेपी राज्यसभा में अपने बहुमत को मजबूत कर सकती है। बीजेपी के रणनीतिकारों का मानना है कि राष्ट्रीय मुद्दों पर डीएमके का समर्थन प्राप्त किया जा सकता है। वर्तमान में, बीजेपी को संसद में दो-तिहाई बहुमत के लिए 70 सांसदों की आवश्यकता है। हाल ही में, परिसीमन बिल पर डीएमके के 22 सांसदों ने भी विरोध किया था।


कांग्रेस से अलगाव का कारण

कांग्रेस के उस निर्णय ने डीएमके और कांग्रेस के गठबंधन को तोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जब कांग्रेस ने डीएमके को छोड़कर थलापति विजय की पार्टी टीवीके के साथ गठबंधन किया। इस कदम को डीएमके ने विश्वासघात के रूप में देखा है। स्थिति और भी बिगड़ गई जब डीएमके ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र लिखकर कांग्रेस से अलग बैठने की मांग की।


बीजेपी-डीएमके के बीच संभावित सहयोग

विश्लेषकों का मानना है कि डीएमके के विपक्ष में जाने के बाद यह संभावना बढ़ गई है कि वह केंद्र में सत्ता के साथ जुड़ना चाहेगी। किसी भी क्षेत्रीय पार्टी के लिए यह आवश्यक है कि वह राज्य या केंद्र में सत्ता में बनी रहे। अटल बिहारी वाजपेयी के समय में, डीएमके एनडीए का हिस्सा रह चुकी है, जो इस बात का संकेत है कि वह फिर से ऐसा कर सकती है।


डीएमके के एनडीए में शामिल होने की चुनौतियां

हालांकि, डीएमके के एनडीए में शामिल होने के रास्ते में कुछ बाधाएं भी हैं। सबसे बड़ी चुनौती है परिसीमन योजना का विरोध। डीएमके सांसदों ने संसद में इस प्रस्ताव का कड़ा विरोध किया था, जिसमें उन्होंने काले कपड़े पहनकर और बिल की प्रति जलाकर अपना विरोध जताया था। इसके अलावा, उदयनिधि स्टालिन के सनातन के खिलाफ बयान भी एक बड़ी बाधा हो सकती है।