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तमिलनाडु विधानसभा में राज्यपाल का विवाद: क्या है असहमति की वजह?

तमिलनाडु विधानसभा के शीतकालीन सत्र में राज्यपाल आरएन रवि ने भाषण पढ़ने से इनकार कर दिया, जिससे राजनीतिक तनाव बढ़ गया। मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने इसे जनता का अपमान बताया और संवैधानिक संशोधन की बात की। राज्यपाल और डीएमके सरकार के बीच मतभेद बढ़ते जा रहे हैं, खासकर जब से राज्यपाल ने पिछले तीन वर्षों में औपचारिक संबोधन नहीं दिया। जानें इस विवाद के पीछे की वजहें और विधानसभा अध्यक्ष का क्या कहना है।
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तमिलनाडु विधानसभा में राज्यपाल का विवाद: क्या है असहमति की वजह?

राज्यपाल का भाषण न पढ़ना: राजनीतिक तनाव का नया अध्याय


नई दिल्ली: तमिलनाडु विधानसभा के शीतकालीन सत्र की शुरुआत में राजनीतिक हलचल उस समय बढ़ गई जब राज्यपाल आरएन रवि ने राष्ट्रगान के कथित अपमान का हवाला देते हुए राज्य सरकार द्वारा प्रस्तुत पारंपरिक भाषण को पढ़ने से मना कर दिया और सदन से बाहर चले गए। यह तीसरा साल है जब राज्यपाल ने विधानसभा में औपचारिक संबोधन नहीं दिया, जिससे डीएमके सरकार और राजभवन के बीच टकराव और बढ़ गया है।


मुख्यमंत्री का कड़ा बयान

मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने इस कदम पर कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए इसे तमिलनाडु की जनता का अपमान बताया। उन्होंने राज्यपाल के पारंपरिक संबोधन को समाप्त करने के लिए संवैधानिक संशोधन की प्रक्रिया शुरू करने की बात कही और सदन में राज्यपाल के भाषण का अंग्रेजी संस्करण पढ़ने का प्रस्ताव भी रखा।


तीसरे साल भी भाषण नहीं पढ़ा गया

राज्यपाल आरएन रवि और डीएमके सरकार के बीच मतभेद मई 2021 में उनकी नियुक्ति के बाद से ही स्पष्ट हो गए थे। 2022 में उन्होंने औपचारिक संबोधन दिया था, लेकिन 2023 में भाषण के कुछ हिस्से हटाकर अपनी टिप्पणियां जोड़ दी थीं। इसके बाद 2024 और 2025 में उन्होंने बिना भाषण पढ़े ही विधानसभा से बाहर जाने का निर्णय लिया।


राज्यपाल कार्यालय का बयान

राज्यपाल कार्यालय ने एक बयान जारी कर कहा कि राष्ट्रगान का अपमान हुआ है और "मौलिक संवैधानिक कर्तव्य की अवहेलना की गई है।" बयान में यह भी कहा गया कि रवि का माइक बार-बार बंद किया गया और उन्हें बोलने का अवसर नहीं दिया गया।


राजभवन ने यह भी आरोप लगाया कि जिस भाषण को पढ़ने से राज्यपाल ने मना किया, उसमें निराधार और भ्रामक दावे शामिल थे। बयान में महिलाओं की सुरक्षा, मादक पदार्थों के प्रसार, दलितों पर हमलों और शिक्षा स्तर में गिरावट जैसे मुद्दों की अनदेखी का उल्लेख किया गया।


निवेश और मंदिरों पर सवाल उठाए गए

राज्यपाल कार्यालय ने 12 लाख करोड़ रुपये से अधिक निवेश के दावे को "सत्य से कोसों दूर" बताया। इसके साथ ही प्राचीन मंदिरों के संरक्षण और जीर्णोद्धार के लिए उच्च न्यायालय के निर्देशों का पालन न होने का भी आरोप लगाया गया। बयान में कहा गया, "राज्य में कई हजार मंदिर बिना न्यासी मंडल के हैं और सीधे राज्य सरकार द्वारा प्रशासित हैं… श्रद्धालुओं की भावनाओं को बेरहमी से नजरअंदाज किया जा रहा है।"


विधानसभा अध्यक्ष का भाषण

राज्यपाल के सदन से बाहर जाने के बाद विधानसभा अध्यक्ष एम. अप्पावु ने तमिल भाषा में वही भाषण पढ़ा। इसमें भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार से तमिलनाडु को देय धनराशि जारी करने की मांग की गई।


भाषण में कहा गया, "यह अत्यंत चिंता का विषय है कि केंद्र सरकार राज्य सरकार के प्रति प्रतिकूल रवैया अपना रही है, जिसके कारण कई आवश्यक परियोजनाओं के अनुमोदन और वित्तीय आवंटन बाधित हो रहे हैं।"


आपदा राहत पर नाराजगी

भाषण में चक्रवात मिचौंग और फेंगल जैसी प्राकृतिक आपदाओं के दौरान केंद्र से अपर्याप्त सहायता मिलने पर निराशा व्यक्त की गई। समग्र शिक्षा योजना के तहत 3,548 करोड़ रुपये जारी न होने का जिक्र करते हुए कहा गया कि इसका पूरा बोझ राज्य सरकार को उठाना पड़ा। इसके अलावा, केंद्र से महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के स्थान पर लाई गई वीबी-जी-राम-जी योजना को वापस लेने की मांग भी दोहराई गई।


तीन-भाषा फार्मूले पर स्टालिन का रुख

भाषण में स्पष्ट किया गया कि तमिलनाडु तीन-भाषा फार्मूले को स्वीकार नहीं करेगा और हिंदी थोपे जाने का विरोध जारी रहेगा।


मुख्यमंत्री स्टालिन ने कहा, "यह ठीक नहीं है कि सरकार हर साल भाषण तैयार करे और राज्यपाल उसे ठीक से पढ़े बिना असहमति जताए… जब कोई लगातार इस परंपरा का उल्लंघन करता है, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि नियमों का पालन क्यों किया जाए।"