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तेलंगाना विधान परिषद में अजहरुद्दीन और कोडंडाराम रेड्डी की शपथ

तेलंगाना के अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री मोहम्मद अजहरुद्दीन और प्रोफेसर एम. कोडंडाराम रेड्डी ने विधान परिषद के सदस्य के रूप में शपथ ली। इस महत्वपूर्ण समारोह में मुख्यमंत्री और अन्य प्रमुख नेता भी शामिल हुए। राज्यपाल ने इन दोनों को राज्यपाल कोटे से नियुक्त किया था, लेकिन यह नियुक्ति लंबित अपीलों के निर्णय पर निर्भर करेगी। जानें इस घटनाक्रम के पीछे की कहानी और इसके राजनीतिक महत्व के बारे में।
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तेलंगाना विधान परिषद में अजहरुद्दीन और कोडंडाराम रेड्डी की शपथ

तेलंगाना विधान परिषद में नए सदस्यों की शपथ

तेलंगाना के अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री मोहम्मद अजहरुद्दीन और प्रोफेसर एम. कोडंडाराम रेड्डी ने सोमवार को राज्य विधान परिषद (एमएलसी) के सदस्य के रूप में शपथ ग्रहण किया।


उन्हें परिषद के सभापति जी. सुखेन्द्र रेड्डी ने विधानसभा भवन में आयोजित समारोह में शपथ दिलाई। इस अवसर पर मुख्यमंत्री ए. रेवंत रेड्डी, उनके कैबिनेट के मंत्री, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष महेश कुमार गौड़ और अन्य पार्टी नेता भी उपस्थित थे।


राज्यपाल शिव प्रताप शुक्ल ने रविवार को अजहरुद्दीन और कोडंडाराम रेड्डी को राज्यपाल कोटे से विधान परिषद का सदस्य नियुक्त किया था। हालांकि, सरकार की अधिसूचना के अनुसार, यह नियुक्ति इस मामले से संबंधित सभी लंबित अपीलों के अंतिम निर्णय पर निर्भर करेगी।


अधिसूचना में बताया गया कि दोनों को डी. राजेश्वर राव और फारूक हुसैन की जगह नियुक्त किया गया है, जिनका कार्यकाल 27 मई 2023 को समाप्त हो गया था।


पूर्व भारतीय क्रिकेट कप्तान अजहरुद्दीन का एमएलसी बनना सत्ताधारी कांग्रेस पार्टी के लिए एक सकारात्मक संकेत माना जा रहा है। उन्होंने 31 अक्टूबर 2025 को मंत्री पद की शपथ ली थी और मंत्री बने रहने के लिए उनके लिए 30 अप्रैल तक विधानसभा या विधान परिषद का सदस्य बनना आवश्यक था।


इन नामांकनों के साथ लंबे समय से चल रही अनिश्चितता समाप्त हो गई है। तेलंगाना कैबिनेट ने 30 अगस्त 2025 को राज्यपाल कोटे के तहत विधान परिषद (एमएलसी) में नामांकन के लिए अजहरुद्दीन और कोडंडाराम के नामों की सिफारिश की थी।


हालांकि, सुप्रीम कोर्ट में मामला लंबित होने के कारण राज्यपाल ने इन नामांकनों को मंजूरी नहीं दी थी। मुख्यमंत्री ए. रेवंत रेड्डी ने 19 अप्रैल को राज्यपाल से मुलाकात कर उनसे लंबित नामांकनों को मंजूरी देने का अनुरोध किया था।


पिछले महीने मुख्यमंत्री ने सुप्रीम कोर्ट की उस टिप्पणी का हवाला दिया था, जिसमें कहा गया था कि इस मामले में अदालत को कोई आपत्ति नहीं है और राज्य सरकार राज्यपाल से मंजूरी के लिए आगे बढ़ सकती है।