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नागपुर महानगर निगम चुनाव: बीजेपी की साख दांव पर, सहयोगियों से बढ़ी चुनौतियाँ

नागपुर महानगर निगम चुनाव में बीजेपी की साख दांव पर है, जहाँ सहयोगी दलों और बागियों के कारण चुनौतियाँ बढ़ गई हैं। पिछले 15 वर्षों से सत्ता में रहने वाली बीजेपी इस बार भी जीत की उम्मीद कर रही है, लेकिन कई दावेदारों के कारण वोटों का बंटवारा हो सकता है। जानें कैसे कांग्रेस और अन्य दलों ने चुनावी समीकरण को प्रभावित किया है और फडणवीस के लिए यह चुनाव कितनी महत्वपूर्ण है।
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नागपुर महानगर निगम चुनाव: बीजेपी की साख दांव पर, सहयोगियों से बढ़ी चुनौतियाँ

नागपुर का राजनीतिक महत्व


महाराष्ट्र की उपराजधानी नागपुर, मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी का गढ़ है। यहाँ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) का मुख्यालय भी स्थित है, जिससे नागपुर महानगर निगम चुनाव पर पूरे देश की नजरें टिकी हुई हैं। पिछले 15 वर्षों से बीजेपी यहाँ सत्ता में है और इस बार भी जीत की उम्मीद कर रही है, लेकिन सहयोगी दलों के कारण चुनौतियाँ बढ़ गई हैं।


चुनावी समीकरण और दलों की स्थिति

नागपुर महानगर निगम में कुल 151 वार्ड हैं। 2017 के चुनाव में बीजेपी ने 108 सीटें जीतकर बहुमत हासिल किया था। इस बार महायुति गठबंधन के तहत बीजेपी ने 143 सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े किए हैं, जबकि एकनाथ शिंदे की शिवसेना को केवल 8 सीटें मिली हैं।


कांग्रेस सभी 151 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ रही है। उद्धव ठाकरे की शिवसेना (यूबीटी) 58 सीटों पर, शरद पवार की एनसीपी 76 सीटों पर और अजित पवार की एनसीपी 96 सीटों पर चुनावी मैदान में हैं। राज ठाकरे की मनसे ने 22 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे हैं। इस तरह के कई दावेदारों के कारण वोटों का बंटवारा होना तय है।


शिंदे गुट के बागी बीजेपी के लिए चुनौती

बीजेपी ने शिंदे की शिवसेना को कम सीटें दीं, जिससे पार्टी के कई नेता नाराज हो गए हैं। 30 से अधिक कार्यकर्ताओं ने निर्दलीय नामांकन कर लिया है और वे अपने नाम वापस लेने के मूड में नहीं हैं। इनमें से कई नेता पहले बीजेपी से जुड़े रहे हैं।


शिंदे गुट के जिला प्रमुख, शहर प्रमुख और पूर्व पदाधिकारी अब बीजेपी उम्मीदवारों के खिलाफ प्रचार कर रहे हैं। इससे हिंदुत्व वोटों में विभाजन का खतरा बढ़ गया है। बीजेपी के कई पूर्व पार्षदों के टिकट कटने से भी अंदरूनी नाराजगी बढ़ी है, जो चुनावी नुकसान का कारण बन सकती है।


कांग्रेस की बढ़ती चिंता

अजित पवार की एनसीपी महायुति से अलग चुनाव लड़ रही है और 96 सीटों पर मजबूत दावेदार उतारे हैं। कई पूर्व बीजेपी और कांग्रेस पार्षद उनके साथ आ गए हैं, जो बीजेपी के वोट काट सकते हैं। दूसरी ओर, शरद पवार की एनसीपी ने 76 सीटों पर उम्मीदवार खड़े किए हैं।


दोनों पवार गुटों के कारण कांग्रेस के पारंपरिक वोट बैंक में सेंध लगने की आशंका है, खासकर दलित, मुस्लिम और अल्पसंख्यक बहुल इलाकों में। कुछ वार्डों में कांग्रेस के अपने कार्यकर्ता भी निर्दलीय चुनाव लड़ रहे हैं।


फडणवीस के लिए साख की लड़ाई

नागपुर बीजेपी का एक मजबूत गढ़ है। फडणवीस खुद यहाँ से युवा मेयर रह चुके हैं और बड़े विकास कार्यों का श्रेय लेते हैं। आरएसएस की मजबूत संगठन शक्ति भी बीजेपी के पक्ष में है। फिर भी, सहयोगियों और बागियों के कारण यह चुनाव अग्निपरीक्षा बन गया है। यदि बीजेपी यहाँ कमजोर प्रदर्शन करती है, तो राज्य स्तर पर भी उसकी साख प्रभावित होगी।