नीतीश कुमार और भाजपा के बीच का संघर्ष: एक राजनीतिक यात्रा
नीतीश कुमार का एनडीए से अलगाव
बिहार में नीतीश कुमार का शासन नरेंद्र मोदी के लिए एक संवेदनशील मुद्दा रहा है। नीतीश, एनडीए के एकमात्र नेता थे, जिन्होंने 2013 में मोदी को एनडीए की चुनाव समिति का प्रमुख और प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाए जाने का विरोध करते हुए एनडीए छोड़ दिया। इसके बाद उन्होंने अकेले चुनाव लड़ा, जबकि मोदी ने रामविलास पासवान और उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी के साथ मिलकर चुनावी मैदान में उतरे। उस चुनाव में भाजपा ने ऐतिहासिक सफलता हासिल की, अकेले 243 सीटें जीतीं, जबकि एनडीए को केवल 32 सीटें मिलीं। नीतीश कुमार की पार्टी मात्र दो सीटों पर सिमट गई। इस हार ने मोदी को यह अहसास कराया कि उन्होंने नीतीश की राजनीतिक हैसियत को दिखा दिया है।
2015 का विधानसभा चुनाव
2015 के विधानसभा चुनाव से पहले, नरेंद्र मोदी ने बिहार के मुजफ्फरपुर में एक सभा में नीतीश कुमार के डीएनए पर सवाल उठाया। प्रधानमंत्री ने कहा कि नीतीश के डीएनए में गड़बड़ी है। चार महीने बाद, चुनाव में नीतीश और लालू की जोड़ी ने भाजपा और उसके सहयोगियों को बुरी तरह हराया। मोदी उस समय प्रधानमंत्री थे और अमित शाह भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे, लेकिन उन्हें केवल 59 सीटें मिलीं। इस हार ने मोदी और शाह को मजबूर किया कि वे नीतीश के साथ फिर से तालमेल करें।
2020 के चुनाव में भाजपा की रणनीति
2020 के चुनाव में भाजपा ने नीतीश को निपटाने की योजना बनाई और चिराग पासवान को गठबंधन से अलग चुनाव लड़वाया। चिराग को सभी संसाधन भाजपा ने दिए, लेकिन उनका उद्देश्य नीतीश को हराना था। हालांकि, परिणाम भाजपा के अनुकूल नहीं रहे। नीतीश ने 43 सीटें जीतीं, जबकि राजद ने 75 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बन गई। महागठबंधन को 110 सीटें मिलीं, जिससे नीतीश को फिर से मुख्यमंत्री बनाना पड़ा।
भाजपा और नीतीश का जटिल रिश्ता
भाजपा को नीतीश का आभार व्यक्त करना चाहिए था, क्योंकि उनकी वजह से एनडीए को लोकसभा में 30 सीटें मिलीं। लेकिन भाजपा नेताओं ने नीतीश को खत्म करने की योजना बनाई। इस बार विधानसभा चुनाव में नीतीश की पार्टी ने 85 सीटें जीतीं, लेकिन राजनीतिक गणित ने उन्हें दूसरे पाले में जाकर सरकार बनाने में मुश्किलें पेश कीं। नीतीश कुमार की मानसिक स्थिति बिगड़ गई, जिससे भाजपा ने उन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी से हटाने का प्रयास किया।
