पश्चिम बंगाल के मतदाता सूची में अनिश्चितता: 34 लाख मतदाता प्रभावित
मतदाता सूची में विसंगतियाँ
पश्चिम बंगाल में 34 लाख मतदाताओं का भविष्य अब संकट में है। इनमें से 27 लाख से अधिक लोग ऐसे हैं जिनके पास आवश्यक दस्तावेज हैं, लेकिन उन्हें तार्किक विसंगति के आधार पर मतदाता सूची से बाहर कर दिया गया है। इस मामले की सुनवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट ने 19 न्यायाधिकरण स्थापित किए हैं, जिनमें सुनवाई की गति बेहद धीमी है। इन न्यायाधिकरणों ने पहले चरण के मतदान, जो 23 अप्रैल को होना है, से दो दिन पहले तक 657 मामलों की सुनवाई की। लगभग दो हफ्तों में इतनी सुनवाई हुई, जिसमें से 139 व्यक्तियों के नाम की मंजूरी दी गई, यानी करीब 20 प्रतिशत के दस्तावेज सही पाए गए। दूसरे चरण से पहले 1,468 और लोगों के नाम की मंजूरी मिलने की सूचना है। अब सवाल यह है कि बाकी बचे लोगों का क्या होगा? न्यायाधिकरण की वर्तमान गति को देखते हुए, सभी मामलों की सुनवाई में कई महीने लग सकते हैं।
न्यायाधिकरण की चुनौतियाँ
हालांकि, यह केवल समय का मुद्दा नहीं है। यह भी महत्वपूर्ण है कि न्यायाधिकरण से जिन लगभग 80 प्रतिशत लोगों के नाम खारिज किए जाएंगे, उनका क्या होगा? ध्यान देने योग्य है कि तार्किक विसंगति के आधार पर जिन 27 लाख 10 हजार लोगों के नाम हटाए गए थे, वे पहले मतदाता सूची में शामिल थे। इनमें से कई लोग ऐसे हैं जिनके परिवार के अन्य सदस्यों के नाम अभी भी मतदाता सूची में हैं। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा था कि ये लोग न्यायाधिकरण के समक्ष नए दस्तावेज पेश कर सकते हैं। लेकिन अब तक की जानकारी के अनुसार, न्यायाधिकरण में नए दस्तावेज स्वीकार नहीं किए जा रहे हैं। इसके अलावा, तार्किक विसंगति वाले 27 लाख नामों के अलावा, सात लाख और आपत्तियाँ भी आई हैं। यदि इनमें से 20 प्रतिशत यानी सात लाख के नाम मंजूर होते हैं, तो बाकी का क्या होगा? क्या इन्हें विदेशी मानकर देश से बाहर किया जाएगा? यह एक गंभीर प्रश्न है कि क्या एक व्यक्ति जो मतदाता होने के योग्य नहीं है, वह देश में रहने के लिए भी योग्य है? क्या उसका आधार कार्ड या राशन कार्ड बन सकता है और क्या वह नागरिक सुविधाओं का लाभ उठा सकता है?
