पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव: भाजपा और ममता बनर्जी के बीच प्रतिष्ठा की लड़ाई
पश्चिम बंगाल की चुनावी लड़ाई का महत्व
पश्चिम बंगाल विधानसभा का चुनाव केवल एक सामान्य चुनाव नहीं है, बल्कि यह भारतीय जनता पार्टी और उसके नेताओं नरेंद्र मोदी और अमित शाह के लिए प्रतिष्ठा की लड़ाई बन गई है। यह चुनाव मोदी और ममता बनर्जी के बीच एक कल्ट की लड़ाई है, जिसमें भाजपा और उसके विरोधियों के बीच बुनियादी नैरेटिव की भी टकराहट हो रही है। खासकर, दक्षिण भारत को छोड़कर, बंगाल एक ऐसा राज्य है जहां मोदी और शाह का जादू नहीं चल रहा है।
भाजपा की चुनौतियाँ
भाजपा ने बिहार में नीतीश कुमार के साथ गठबंधन कर चुनावी रणनीति को समझा, लेकिन बंगाल में उसे ममता बनर्जी के खिलाफ अकेले लड़ना है। ममता के खिलाफ लड़ाई में भाजपा ने लेफ्ट और कांग्रेस की ताकत को समाप्त किया है, लेकिन अभी भी वह ममता को हराने में सफल नहीं हो पाई है।
ध्रुवीकरण की राजनीति
पश्चिम बंगाल में भाजपा की लड़ाई हिंदू बनाम मुस्लिम ध्रुवीकरण की राजनीति का एक टेस्ट केस है। यहां मुस्लिम आबादी लगभग 30 प्रतिशत है, जबकि हिंदू आबादी 70 प्रतिशत के करीब है। भाजपा को पिछले तीन चुनावों में 40 प्रतिशत वोट मिले हैं, जो दर्शाता है कि हिंदू वोटों में ध्रुवीकरण हो रहा है।
भाजपा की रणनीति
भाजपा को 70 प्रतिशत हिंदू वोटों में से 70 प्रतिशत प्राप्त करने की आवश्यकता है, ताकि वह चुनाव जीत सके। पिछले चुनाव में मुस्लिम वोटों का बंटवारा नहीं हुआ था, जिससे ममता को फायदा हुआ। इस बार, ममता ने धार्मिकता को बढ़ावा देने के लिए कई कदम उठाए हैं, जैसे कि जगन्नाथ धाम का निर्माण।
भाजपा की संभावनाएँ
अगर भाजपा इस बार भी हिंदू ध्रुवीकरण में सफल नहीं होती है, तो उसे अपनी रणनीति में बदलाव करना होगा। चुनाव में घुसपैठियों के मुद्दे को भी प्रमुखता दी जा रही है, और यह देखना होगा कि क्या यह भाजपा के लिए फायदेमंद साबित होगा।
चुनाव की अन्य चुनौतियाँ
पश्चिम बंगाल में विकास के मुद्दे और भ्रष्टाचार के आरोप भी चुनाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। ममता बनर्जी पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं, लेकिन वह खुद को बेदाग साबित करने में सफल रही हैं। इस साल के चुनावों में पश्चिम बंगाल का चुनाव सबसे दिलचस्प होने की संभावना है।
