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पाकिस्तान और इज़राइल के बीच परमाणु संघर्ष की कहानी

इस लेख में पाकिस्तान और इज़राइल के बीच के जटिल संबंधों का विश्लेषण किया गया है, जिसमें भुट्टो के ऐलान से लेकर 1980 के दशक में इज़राइल द्वारा भारत को दिए गए प्रस्ताव तक की चर्चा की गई है। जानें कैसे इंदिरा गांधी ने एक महत्वपूर्ण ऑपरेशन को रद्द किया और अब्राहम समझौते के माध्यम से इस्लामाबाद और तेल अवीव के बीच की दुश्मनी को समाप्त करने की कोशिश की जा रही है।
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पाकिस्तान और इज़राइल के बीच परमाणु संघर्ष की कहानी

भुट्टो का ऐलान और भारत-इज़राइल संबंध

1971 के युद्ध के बाद, बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के दौरान पाकिस्तान के वजीर-ए-आला जुल्फिकार अली भुट्टो ने एक बार कहा था कि भारत के खिलाफ वे 100 साल तक लड़ाई करेंगे। उन्होंने यह भी कहा था कि पाकिस्तान घास-फूस खाकर भी परमाणु बम बनाएगा। भुट्टो ने यह सवाल उठाया कि जब ईसाई और यहूदी बम हैं, तो इस्लामिक बम क्यों नहीं होना चाहिए? एक दशक बाद, 1980 के दशक की शुरुआत में, इज़राइल और भारत ने एक-दूसरे के साथ संबंध स्थापित करने की दिशा में कदम बढ़ाया, जबकि उस समय दोनों देशों के बीच पूर्ण राजनयिक संबंध नहीं थे। भारत-इज़राइल के औपचारिक संबंध 1992 में स्थापित हुए।


इज़राइल का भारत को प्रस्ताव

जब पाकिस्तान अपने परमाणु हथियार विकसित कर रहा था, तब इज़राइल ने भारत को एक बड़ा प्रस्ताव दिया था। इज़राइल ने सुझाव दिया कि दोनों मिलकर पाकिस्तान के परमाणु ठिकानों पर हमला करें। हालांकि, भारत ने उस समय इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया। 1980 के दशक में, इज़राइल ने भारत को यह जानकारी दी थी कि पाकिस्तान परमाणु बम बनाने के करीब है।


मोसाद और रॉ का खुफिया नेटवर्क

1980-81 के दौरान, भारत को यह जानकारी मिली कि पाकिस्तान परमाणु परीक्षण करने की योजना बना रहा है। रॉ के एजेंटों ने काहूटा में जाकर सत्यापन करने की कोशिश की, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली। हालांकि, एक बार्बर के माध्यम से कुछ बालों के नमूने लिए गए, जिनमें यूरेनियम की मात्रा पाई गई। यह पुष्टि करता है कि काहूटा में गुप्त रूप से यूरेनियम का संवर्धन हो रहा था।


इंदिरा गांधी का निर्णय

भारत और इज़राइल ने मिलकर एक संयुक्त ऑपरेशन की योजना बनाई थी, जिसमें भारतीय और इज़राइली लड़ाकू विमानों का उपयोग किया जाना था। हालांकि, इंदिरा गांधी ने अंततः इस अभियान को रद्द कर दिया। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिकी दबाव के कारण उन्होंने यह निर्णय लिया। 1998 में पाकिस्तान ने परमाणु बम हासिल कर लिया, जिसने दक्षिण एशिया के भू-राजनीतिक परिदृश्य को बदल दिया।


अब्राहम समझौते का प्रभाव

2026 में, अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पाकिस्तान पर इज़राइल को मान्यता देने का दबाव डाला। यह समझौता पाकिस्तान के लिए एक संवेदनशील मुद्दा रहा है, क्योंकि इज़राइल को मान्यता देना हमेशा से फिलिस्तीन के मुद्दे से जुड़ा रहा है। इस प्रकार, पाकिस्तान और इज़राइल के बीच की दुश्मनी को समाप्त करने के लिए एक नई वास्तविकता को स्वीकार करने की आवश्यकता है।