पेट्रोल-डीजल की कीमतों में वैश्विक उथल-पुथल: भारत पर प्रभाव
वैश्विक ईंधन संकट का असर
ईरान और मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के कारण, वैश्विक स्तर पर पेट्रोल और डीजल की कीमतों में तेजी आई है। जबकि अन्य देशों में ईंधन की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं, भारत में अभी तक इसका कोई प्रभाव नहीं देखा गया है। कई देशों में कीमतों में इतनी वृद्धि हुई है कि लोग 2008 की आर्थिक मंदी की तरह तैयारियों में जुट गए हैं। आने वाले समय में भारत में भी इसका असर देखने को मिल सकता है। फरवरी के अंत में संकट बढ़ने के कुछ दिनों बाद, कई देशों में ईंधन की कीमतें बढ़ने लगीं, जिससे परिवहन लागत और घरेलू बजट पर असर पड़ा है.
महंगाई का सबसे अधिक असर किन देशों पर?
ग्लोबल फ्यूल ट्रैकर के अनुसार, 95-ऑक्टेन पेट्रोल की कीमतों में भारी वृद्धि हुई है। आयात पर निर्भर देशों की स्थिति सबसे खराब है:
- कंबोडिया और वियतनाम: कंबोडिया में पेट्रोल की कीमत 67.81% बढ़ गई है, जबकि वियतनाम में यह 49.73% तक पहुंच गई है।
- पाकिस्तान: यहां कीमतों में 24.49% की वृद्धि हुई है, जिसके कारण चार दिन का कार्य सप्ताह लागू करना पड़ा और स्कूल बंद कर दिए गए हैं।
- विकसित देशों की स्थिति: कनाडा में 28.36%, अमेरिका में 16.55% और जर्मनी में 13.30% तक कीमतें बढ़ चुकी हैं।
एशिया में इमरजेंसी जैसी स्थिति
खाड़ी देशों पर निर्भर एशिया की स्थिति सबसे गंभीर है। जापान, जो 95% तेल आयात करता है, को अपने रिजर्व से तेल निकालना पड़ रहा है। दक्षिण कोरिया ने 30 वर्षों में पहली बार ईंधन की कीमतों पर ऊपरी सीमा निर्धारित की है। बांग्लादेश ने ऊर्जा बचाने के लिए अपनी विश्वविद्यालयें बंद करने का निर्णय लिया है।
भारत में राहत का कारण
इस वैश्विक संकट के बीच, भारत एक अपवाद बना हुआ है। भारत अपनी जरूरत का 85% से अधिक कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है, फिर भी 28 फरवरी से 19 मार्च के बीच दिल्ली (₹94.77) और मुंबई (₹103.50) में पेट्रोल की कीमतें स्थिर हैं। भारत में पेट्रोल की कीमतें पूरी तरह से बाजार के नियंत्रण में नहीं हैं; सरकार का प्रशासनिक नियंत्रण और टैक्स ढांचा इस वैश्विक संकट का प्रभाव आम जनता तक नहीं पहुंचने दे रहा है।
आर्थिक संकट की चेतावनी
हालांकि राहत हमेशा के लिए नहीं है। यदि कच्चे तेल की कीमतें इसी तरह ऊंची बनी रहीं, तो तेल मार्केटिंग कंपनियों को भारी नुकसान होगा। अर्थशास्त्रियों ने चेतावनी दी है कि इस संकट के कारण परिवहन, खाद्य सामग्री और अन्य सामान महंगे हो जाएंगे। यदि स्थिति में सुधार नहीं हुआ, तो दुनिया 1973, 1978 और 2008 जैसी गंभीर आर्थिक मंदी का सामना कर सकती है।
