प्रधानमंत्री मोदी की वैश्विक छवि पर संकट: शिखर सम्मेलनों का विडंबनापूर्ण परिणाम
प्रधानमंत्री की छवि का संकट
यह विडंबना ही है कि जिन दो प्रमुख सम्मेलनों ने प्रधानमंत्री की वैश्विक छवि को चमकाने का प्रयास किया, वे दोनों ही असफल साबित हुए। इसका कारण समझना आवश्यक है। लेकिन पहले यह जानना जरूरी है कि यह मायाजाल क्या था और इसे कैसे तैयार किया गया।
नई दिल्ली में आयोजित आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस सम्मेलन ने प्रधानमंत्री मोदी के तिलिस्म के टूटने की पुष्टि की। पश्चिमी मीडिया की कवरेज और टेक क्षेत्र के कई विशेषज्ञों की प्रतिक्रियाओं से यह स्पष्ट हो गया है। 2023 में जी-20 शिखर सम्मेलन के बाद जो प्रक्रिया शुरू हुई थी, वह अब एक ठोस वास्तविकता बन चुकी है।
इसका कारण समझना महत्वपूर्ण है। लेकिन पहले यह जानना आवश्यक है कि यह तिलिस्म क्या था और इसे कैसे निर्मित किया गया।
तिलिस्म यह था कि भारत में एक ऐसा नेता उभरा है, जिसके पास हर समस्या का समाधान है। यह कहानी गढ़ी गई कि मोदी ने गुजरात का कायाकल्प किया और अब वे राष्ट्रीय स्तर पर वही करिश्मा दिखाने आए हैं। यदि कोई नेता भारत जैसे विविधता-पूर्ण और समस्याओं से ग्रस्त देश में चमत्कारी उपलब्धियां हासिल कर सकता है, तो यह स्वाभाविक है कि दुनिया की रुचि उस पर होगी।
इसी तिलिस्म के आधार पर मोदी की मीडिया टीम ने भारत में 'सत्तर साल में कुछ नहीं हुआ' का नारा फैलाने में सफलता प्राप्त की।
यह भी कहा गया कि भारत अब 'दब्बूपन' से निकलकर 'लाल आंखें दिखाने' के दौर में प्रवेश कर गया है। जब मोदी का उदय हुआ, उस समय पश्चिम भी इस कथा को स्वीकार करने के लिए तैयार था।
यह यूं ही नहीं था कि जिस मोदी को गुजरात के मुख्यमंत्री रहते अमेरिका ने एक दशक तक वीजा नहीं दिया, उनके प्रधानमंत्री बनने के कुछ महीनों बाद ही अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा 2015 में गणतंत्र दिवस पर मुख्य अतिथि बनकर भारत आए।
तिलिस्म की पृष्ठभूमि
मोदी के तिलिस्मी उदय के पीछे 1990 के दशक की राजनीतिक घटनाएं थीं। उस दशक में मार्केट, मंडल और मंदिर की घटनाओं ने भारतीय राजनीति को नया आकार दिया। जब मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री बने, तो उन्होंने खुद को इन तीनों घटनाओं का प्रतिनिधि मानते हुए उग्र मुस्लिम विरोधी रुख अपनाया।
इससे उन्होंने हिंदुत्व का सबसे स्पष्ट चेहरा बनकर उभरे। उनकी पिछड़ी जाति की पृष्ठभूमि ने भाजपा को सवर्ण पार्टी के रूप में चित्रित करने की सामाजिक न्याय समर्थक पार्टियों की रणनीति को कमजोर किया।
इस तरह, मोदी ने पूंजीपतियों को अपने पीछे लामबंद किया। 2014 के आम चुनाव में उनके समर्थन से 'गुजरात मॉडल' और 'अच्छे दिन' के वादों पर आधारित मुहिम ने प्रतिस्पर्धियों को धराशायी कर दिया।
इस पृष्ठभूमि में मोदी ने भारत की विशेषता के रूप में democracy, demography और demand का जुमला उछाला, जिसे पश्चिम में गंभीरता से लिया गया।
हालांकि, 2023 में इस परिघटना पर विराम लगने लगा। इसका कारण मोदी सरकार का व्यवहार और बदलती अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियां थीं।
शक्ति का अति-प्रदर्शन
मोदी और उनके सलाहकारों ने अपनी शक्ति का गलत आकलन किया। इससे भाजपा समर्थक प्रवासी भारतीयों में यह संदेश गया कि अब भारत में मजबूत सरकार है, इसलिए वे अन्य देशों में भी वैसा ही व्यवहार कर सकते हैं।
लेकिन मोदी और उनके करीबी यह नहीं समझ पाए कि 'लाल आंखें' दिखाने की कहानियों के जरिए भारतीय जनमानस में जोश भरना आसान है, लेकिन विदेशों में इसे लागू करना जोखिम भरा है।
इससे भारत की छवि पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा है।
इन घटनाओं पर गौर करें:
भारत की एजेंसियों पर आरोप लगे कि वे अपनी सरहद से बाहर जाकर अपराधियों का सफाया कर रही हैं।
पाकिस्तान जैसे देशों में यह धारणा लाभकारी हो सकती है, लेकिन जब यह आरोप कनाडा, ब्रिटेन और अमेरिका तक पहुंचे, तो इसके विपरीत परिणाम आए।
ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका में भारतीय मूल के कुछ समूहों ने हिंदुत्ववादी राजनीति का प्रदर्शन किया, जिससे पश्चिम में यह धारणा बनी कि भारत अपनी 'संप्रदाय आधारित राजनीति' का निर्यात कर रहा है।
कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रुडो की भारत यात्रा के दौरान उन्हें 'लाल आंखें' दिखाई गईं।
जी-20 समिट के दौरान जब अमेरिकी नेताओं ने सिख आतंकवादी की हत्या के पीछे भारत के हाथ की चर्चा की, तो भारतीय अधिकारियों ने इसे नकार दिया।
इन घटनाक्रमों ने मोदी काल में भारत की छवि को बुरी तरह प्रभावित किया है।
इस बीच democracy, demography और demand की वास्तविकता भी खुलने लगी है। मोदी काल में भारतीय अर्थव्यवस्था की दिशा पहले से ही तय की जा चुकी थी, लेकिन कोरोना काल के बाद इसका स्वरूप स्पष्ट हो गया।
आज स्थिति यह है कि भारतीय कंपनियां अपनी उत्पादन क्षमता का पूरा उपयोग नहीं कर पा रही हैं, क्योंकि बाजार में मांग नहीं है।
डोनाल्ड ट्रंप के दौर में अमेरिकी प्राथमिकताएं भी बदल गई हैं। चीन को घेरना अभी भी उनका मकसद है, लेकिन भारत की उपयोगिता का पुनर्मूल्यांकन हो रहा है।
इन घटनाक्रमों ने मोदी काल के तिलिस्म को कमजोर कर दिया है।
इस बीच, एआई क्षेत्र में भारत की शक्ति को बिना ठोस आधार के पेश करने का प्रयास किया गया, जिससे असहज स्थितियां उत्पन्न हुई हैं।
इसका सार यह है कि मोदी के तिलिस्म पर अब दुनिया को भरोसा नहीं रहा। हालांकि, उनकी छवि एक सक्षम नेता की बनी हुई है, इसलिए यह संभव है कि वे आगामी चुनावों में भाजपा को जीत दिलाने में सक्षम रहें।
