प्रशांत किशोर की राजनीतिक यात्रा: चुनौतियाँ और संभावनाएँ
प्रशांत किशोर का नुकसान और भविष्य की संभावनाएँ
यह समझना आवश्यक है कि प्रशांत किशोर ने बिहार में क्या खोया है। चाहे वे इसे स्वीकार करें या नहीं, लेकिन एक अनुभवी चुनाव प्रबंधक के रूप में उन्होंने पिछले एक दशक में जो प्रतिष्ठा बनाई थी, वह अब बिहार में खो गई है। उनके द्वारा खर्च किए गए दो सौ या चार सौ करोड़ रुपये का नुकसान महत्वपूर्ण नहीं है। उनकी पार्टी का पहला चुनाव हारना भी कोई असामान्य बात नहीं है। कई उदाहरण हैं जब पार्टियों ने पहले चुनाव में खराब प्रदर्शन के बाद धीरे-धीरे मजबूती हासिल की।
उदाहरण के लिए, नीतीश कुमार की समता पार्टी, जिसे अब जनता दल यू कहा जाता है, और उत्तर प्रदेश में कांशीराम द्वारा स्थापित बहुजन समाज पार्टी की शुरुआत भी बहुत खराब रही थी। लेकिन दोनों नेताओं को अपने विचार और विचारधारा पर विश्वास था, इसलिए वे राजनीतिक मैदान में डटे रहे और अंततः सफलता प्राप्त की। इसलिए, प्रशांत किशोर की पहली चुनावी हार उनके राजनीतिक करियर का अंत नहीं है।
उनकी असली चुनौती यह है कि वे कैसे अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा को पुनः प्राप्त करेंगे। यदि वे अपनी साख को वापस हासिल कर लेते हैं और बिहार में सक्रिय रहते हैं, तो निश्चित रूप से वे सफल होंगे। इसके लिए उन्हें क्या कदम उठाने होंगे, यह केवल वे ही जान सकते हैं। वे राजनीति और चुनाव की बारीकियों को भली-भांति समझते हैं।
उन्हें यह भी याद है कि 1995 के विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार ने कैसे राजनीति की थी, जब उनकी पार्टी ने बहुत खराब प्रदर्शन किया था। इसी तरह, कांशीराम ने 1989 में बहुजन समाज पार्टी के साथ क्या किया था, यह भी उन्हें पता है। 1995 में नीतीश कुमार की पार्टी को केवल पांच सीटें मिली थीं, जबकि 1989 में बसपा को 13 सीटें मिली थीं। लेकिन 1993 के मध्यावधि चुनाव में सपा के साथ तालमेल करके बसपा ने 67 सीटें जीतीं।
इसलिए, प्रशांत किशोर के लिए राजनीतिक मार्ग स्पष्ट है। उनके सामने नीतीश कुमार और कांशीराम दोनों के उदाहरण हैं। नीतीश कुमार ने 1995 की हार के बाद भाजपा के साथ गठबंधन किया और 2005 में सत्ता में वापसी की। इसी तरह, कांशीराम ने 1984 में बसपा की स्थापना की और 1995 में मायावती को मुख्यमंत्री बनाने में सफल हुए।
प्रशांत किशोर के लिए यह महत्वपूर्ण है कि वे पहले चुनाव को हारने, दूसरे को हराने और तीसरे को जीतने की रणनीति अपनाएं। तीसरे चुनाव में उन्हें जीत मिली, लेकिन निर्णायक जीत 2007 में मिली जब बसपा ने अकेले दम पर बहुमत हासिल किया। यह स्पष्ट है कि राजनीति में निरंतरता और विभिन्न दलों के साथ गठबंधन सबसे महत्वपूर्ण है।
इसलिए, प्रियंका गांधी वाड्रा से प्रशांत किशोर की मुलाकात को उनकी राजनीतिक रणनीति के अगले कदम के रूप में देखा जा सकता है। उन्होंने पहले कांग्रेस में शामिल होकर पार्टी को पुनर्जीवित करने की योजना बनाई थी। हालांकि, कांग्रेस नेतृत्व के असुरक्षा भाव के कारण यह संभव नहीं हो सका। अब जब दोनों फिर से करीब आ रहे हैं, तो एक नए गठबंधन की संभावना बन रही है।
बिहार की राजनीति में हमेशा एक तीसरी ताकत की गुंजाइश रही है। नीतीश कुमार के उदय से पहले, कांग्रेस, समाजवादी पार्टियों, भाजपा और कम्युनिस्ट पार्टियों ने मजबूती से चुनाव लड़ा। यदि प्रशांत किशोर और कांग्रेस तीसरी ताकत बनने की कोशिश करते हैं, तो बिहार का राजनीतिक परिदृश्य दिलचस्प हो सकता है। अगले कुछ महीनों में बिहार की राजनीति में गुणात्मक परिवर्तन संभव है।
हालांकि, प्रशांत किशोर को पहले चुनाव प्रबंधक और राजनीतिक गुरु के रूप में अपनी खोई हुई साख को पुनः प्राप्त करना होगा। इस साल होने वाले पांच राज्यों के चुनाव उनके लिए एक सुनहरा अवसर हो सकता है। उनकी पुरानी कंपनी आईपैक का करार अब भी ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस के साथ है।
हालांकि, आईपैक के साथ उनका जुड़ाव अब समाप्त हो चुका है। लेकिन उन्होंने तमिलनाडु में फिल्म स्टार विजय की पार्टी टीवीके के साथ करार किया है। 2021 में ममता बनर्जी की जीत ने प्रशांत किशोर को एक सुपरस्टार बना दिया था। यदि तमिलनाडु में त्रिशंकु विधानसभा बनती है, तो यह उनके लिए एक महत्वपूर्ण अवसर हो सकता है।
टीवीके और कांग्रेस के बीच गठबंधन की चर्चा भी प्रशांत किशोर की राजनीति का असर हो सकती है। तमिलनाडु में उनकी भूमिका और चुनाव के बाद उनकी स्थिति बिहार की राजनीति में उनकी और उनकी पार्टी की किस्मत पर निर्भर करेगी। यदि कांग्रेस उन्हें आगे बढ़ाने का मौका देती है, तो यह भी तमिलनाडु के चुनाव परिणामों पर निर्भर करेगा। इस बीच, प्रशांत किशोर और उनका संगठन बिहार में फिर से सक्रिय हो गए हैं।
