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बांग्लादेश के विद्रोह के बाद नेपाल में चुनाव: क्या बदलाव संभव है?

बांग्लादेश में हालिया विद्रोह ने नेपाल में आगामी चुनावों पर सवाल उठाए हैं। क्या बिना किसी संगठित पार्टी के, जो स्पष्ट विचारधारा रखती हो, कोई वास्तविक परिवर्तन संभव है? इस लेख में बांग्लादेश के विद्रोह और नेपाल के चुनावों के बीच के संबंधों की चर्चा की गई है, और यह सवाल उठाया गया है कि क्या राजनीतिक बदलाव की कोई संभावना है। क्या नए चेहरे वास्तव में बदलाव ला पाएंगे, या यह केवल पुराने राजनीतिक परिवारों की वापसी होगी? जानें इस महत्वपूर्ण विषय पर और अधिक।
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बांग्लादेश के विद्रोह के बाद नेपाल में चुनाव: क्या बदलाव संभव है?

बांग्लादेश में विद्रोह और नेपाल के चुनाव

बांग्लादेश में हालिया विद्रोह के परिणाम नेपाल में भी भिन्न नहीं होंगे, जहां आगामी पांच मार्च को आम चुनाव होने वाले हैं। क्या बिना किसी संगठित पार्टी के, जो स्पष्ट विचारधारा और संरचना रखती हो, कोई ऐसा परिवर्तन संभव है जो मूलभूत ढांचे में बदलाव लाए और आम जनता के जीवन स्तर में सुधार करे?


बांग्लादेश में अगस्त 2024 में एक जन विद्रोह हुआ, जिसकी अगुवाई छात्रों ने की, और इसमें आम जनता का एक बड़ा हिस्सा शामिल हुआ। उनकी मुख्य शिकायत थी कि प्रधानमंत्री शेख हसीना वाजेद तानाशाह बन गई हैं, जिन्होंने लगातार तीन आम चुनावों में धांधली की। उनके शासन में केवल उनके करीबी लोगों का भला हुआ, और सवाल पूछने वालों को सताया गया। इस असंतोष के चलते विद्रोह हुआ, जिसके परिणामस्वरूप शेख हसीना को देश छोड़ना पड़ा। उनकी पार्टी, अवामी लीग, को भी जनता के गुस्से का सामना करना पड़ा। 5 अगस्त 2024 को शेख हसीना के देश छोड़ने के बाद एक अंतरिम सरकार ने अवामी लीग को प्रतिबंधित कर दिया। 12 मई 2026 को हुए आम चुनाव में यह पार्टी भाग नहीं ले सकी।


इन घटनाओं से शेख हसीना और उनकी पार्टी से नाराज लोगों को तसल्ली मिली होगी। लेकिन अब जब नए चुनाव के परिणाम सामने आए हैं, तो यह सवाल उठता है कि इस उथल-पुथल का असली परिणाम क्या है? बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) ने दो तिहाई बहुमत से सत्ता में वापसी की है, लेकिन इसमें नया क्या है? यह पार्टी सैन्य तख्तापलट के जरिए सत्ता में आई थी, और अब इसके नेता तारीक रहमान हैं।


इस प्रकार, एक राजनीतिक परिवार को हटाने का परिणाम दूसरे राजनीतिक परिवार की सत्ता में वापसी के रूप में सामने आया है। अतीत में, दोनों पार्टियों ने केवल अपने परिवारों की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को पूरा किया है। ये पार्टियां आर्थिक और सामाजिक निहित स्वार्थों का प्रतिनिधित्व करती हैं, और उनकी ताकत का आधार वही है।


यदि शेख हसीना सामान्य राजनीतिक प्रक्रिया को बाधित नहीं करतीं, तो संभवतः बीएनपी की सरकार सामान्य चुनावों के तहत बन जाती। विद्रोह इसलिए हुआ क्योंकि शेख हसीना ने चुनावों में धांधली की। क्या यह समझा जाए कि इस विद्रोह का उद्देश्य केवल बीएनपी को सत्ता में वापस लाना था, जबकि उनके पास देश को नई दिशा देने की कोई ठोस योजना नहीं थी?


वर्तमान में, बांग्लादेश की राजनीति कंजरवेटिव बीएनपी और धार्मिक कट्टरपंथी जमात-ए-इस्लामी के बीच बंटी हुई है। बहस के मुद्दे पुराने संविधान को बनाए रखने या अधिक इस्लामी शासन के बीच सिमट गए हैं। क्या बांग्लादेश के छात्र इसी बदलाव की आकांक्षा लेकर विद्रोह कर रहे थे?


ये सामान्य सवाल हैं जो हर देश में उठते हैं जब कोई तानाशाह या सरकार जन-आक्रोश का शिकार होती है। अब नेपाल में भी चुनाव होने वाले हैं, जहां पिछले सितंबर में जन-जी प्रतिरोध ने सरकार को गिराने का काम किया था। वहां भीड़ ने कई राजनेताओं की पिटाई की और सरकारी भवनों को जलाया। यह प्रतिरोध सोशल मीडिया पर रोक के खिलाफ शुरू हुआ था, लेकिन जल्द ही यह राजनीतिक संस्कृति के खिलाफ विद्रोह में बदल गया।


नेपाल में विद्रोह के परिणाम भिन्न रहे हैं, क्योंकि वहां के सत्ताधारी राजनेता देश छोड़कर नहीं भागे। नए चेहरे ने सोशल मीडिया के जरिए सरकार का नेतृत्व किया। हालांकि, चुनाव में वही पुराने चेहरे लौट आए हैं, जिन्हें हटाने के लिए जन-जी आंदोलन हुआ था। बालेन शाह, जो पहले रैपर थे, अब प्रधानमंत्री पद के दावेदार हैं।


हालांकि, बालेन शाह के पास देश के विकास के लिए कोई ठोस योजना नहीं है। उनकी पार्टी, राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी, भ्रष्टाचार विरोधी एजेंडे के साथ उभरी थी, लेकिन अब उनकी छवि धूमिल हो गई है।


इस प्रकार, बांग्लादेश, श्रीलंका और नेपाल में विद्रोह के बाद के परिणामों से यह सवाल उठता है कि क्या बिना किसी संगठित पार्टी के, जो स्पष्ट विचारधारा रखती हो, कोई वास्तविक परिवर्तन संभव है? यह प्रश्न हर हालिया जन विद्रोह के बाद और अधिक प्रासंगिक होता जा रहा है।