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बॉम्बे हाई कोर्ट ने 90 वर्षीय महिला के मानहानि मामले को 2046 तक टाला

बॉम्बे हाई कोर्ट ने 90 वर्षीय महिला के मानहानि मामले को 2046 तक टाल दिया है। जस्टिस जितेंद्र एस. जैन ने इसे अहंकार की लड़ाई बताया, जो न्यायिक प्रणाली पर बोझ डालती है। मामले में 20 करोड़ रुपये के मुआवजे की मांग की गई है, लेकिन अदालत ने सुझाव दिया कि इसे बिना शर्त माफी के जरिए सुलझाया जा सकता है। हालांकि, वादी पक्ष मामले को आगे बढ़ाने पर अड़ा रहा। जानें इस विवाद के पीछे की कहानी और अदालत के फैसले के बारे में अधिक जानकारी।
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अहंकार की लड़ाई: बॉम्बे हाई कोर्ट की टिप्पणी

मुंबई - बॉम्बे हाई कोर्ट ने एक मानहानि मामले की सुनवाई के दौरान इसे “अहंकार की लड़ाई” करार दिया है। अदालत ने कहा कि ऐसे विवाद न्यायिक प्रणाली पर अनावश्यक बोझ डालते हैं। जस्टिस जितेंद्र एस. जैन की एकल पीठ ने मामले को अगली सुनवाई के लिए सीधे वर्ष 2046 के बाद सूचीबद्ध करने का आदेश दिया है।


यह मामला 90 वर्षीय तारिणीबेन द्वारा 57 वर्षीय ध्वनि देसाई के खिलाफ 2017 में दायर किया गया था, जिसमें 20 करोड़ रुपये के मुआवजे की मांग की गई है। यह विवाद 2015 में 'श्याम को-ऑपरेटिव हाउसिंग सोसाइटी' की वार्षिक आम बैठक के दौरान हुई कथित घटनाओं से संबंधित है। पिटीशनर्स का कहना है कि उन घटनाओं ने उन्हें मानसिक कष्ट और उत्पीड़न का सामना करना पड़ा, जिसके लिए उन्होंने ब्याज सहित 20 करोड़ रुपये की मांग की है।


जस्टिस जैन की टिप्पणी
जस्टिस जैन ने कहा, “यह उन मामलों में से एक है जहां जीवन के अंतिम पड़ाव पर पक्षकारों के बीच अहंकार की लड़ाई प्रणाली को जाम कर देती है। इससे अदालत उन मामलों को नहीं ले पाती जिन्हें वास्तव में प्राथमिकता की आवश्यकता है।” अदालत ने पहले सुझाव दिया था कि बिना शर्त माफी मांगकर इस विवाद को सुलझाया जा सकता है, लेकिन 90 वर्षीय वादी अभी भी मानहानि के मुकदमे को आगे बढ़ाने पर अड़ी हुई हैं।


समझौते का सुझाव ठुकराया गया
अदालत ने पहले बिना शर्त माफी के जरिए विवाद खत्म करने का सुझाव दिया था, लेकिन वादी पक्ष मामले को आगे बढ़ाने पर अड़ा रहा। न्यायमूर्ति ने स्पष्ट किया कि केवल 'सुपर सीनियर सिटीजन' होने के आधार पर किसी मामले को प्राथमिकता नहीं दी जा सकती। उन्होंने कहा, “मैं इससे ज्यादा कुछ नहीं कहना चाहता, सिवाय इसके कि इस मामले को अगले 20 सालों तक हाथ में न लिया जाए, इसे 2046 के बाद के लिए लिस्ट करें।”



अगली सुनवाई 2046 में
जस्टिस जैन ने अपने आदेश में कहा कि इस मामले को अगले 20 वर्षों तक सूची में न लाया जाए और इसे 2046 के बाद ही सुना जाए। अदालत ने पहले भी पक्षकारों को दस्तावेज और गवाहों से संबंधित प्रक्रिया पूरी करने का अवसर दिया था, लेकिन मामला सुलझने के बजाय लगातार लंबा खिंचता रहा।