भाजपा का चुनावी नारा: स्थानीय संस्कृति के अनुसार बदलाव
भाजपा का नया चुनावी दृष्टिकोण
भारतीय जनता पार्टी इस बार पश्चिम बंगाल, असम और तमिलनाडु में चुनावों के लिए नए नारों के साथ मैदान में उतरेगी। पार्टी को यह समझ में आ गया है कि हिंदुत्व का स्वरूप देशभर में एक समान नहीं है, इसलिए चुनावी रणनीति में भी भिन्नता आवश्यक है। पहले भाजपा ने पूरे देश में 'जय श्रीराम' के नारे का सहारा लिया था, लेकिन अब इसकी सीमाएं स्पष्ट हो गई हैं। 2021 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी ने भाजपा को यह एहसास कराया कि यह नारा हर जगह प्रभावी नहीं है। हालांकि, इस नारे ने भाजपा को गैर-बांग्लाभाषी हिंदुओं का समर्थन दिलाया, लेकिन बांग्लाभाषी हिंदू इससे दूर रहे। वहां बांग्ला अस्मिता और धार्मिक पहचान का गहरा संबंध है।
बांग्ला संस्कृति में मातृशक्ति की पूजा की जाती है, जहां दुर्गा और काली की आराधना होती है। इसलिए 'जय श्रीराम' का नारा भाजपा के लिए उतना प्रभावी नहीं रहा। भाजपा और आरएसएस की कोशिशें सभी हिंदुओं को एक समान पूजा पद्धति में लाने की भी वहां सफल नहीं हुईं। ममता बनर्जी ने चुनाव के दौरान 'जय मां काली' का नारा दिया और काली की पूजा के मंत्रों का जाप किया। पिछले पांच वर्षों में उन्होंने कई मंदिरों का उद्घाटन किया, जिसमें जगन्नाथ धाम और दुर्गा आंगन शामिल हैं। ममता की यह रणनीति भाजपा को अपने नारों में बदलाव के लिए मजबूर कर रही है।
इस बार भाजपा का नया नारा 'जय मां काली' है। खास बात यह है कि पार्टी ने अपने संगठन और चुनाव प्रभारी को पर्दे के पीछे रहने का निर्देश दिया है। स्थानीय नेता बांग्ला संस्कृति और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार प्रचार कर रहे हैं। इसी तरह, तमिलनाडु में भी भाजपा का नारा बदला हुआ होगा। वहां, सत्तारूढ़ डीएमके की भावना को ध्यान में रखते हुए, भाजपा 'जय श्री मुरुगन' का नारा अपनाएगी। मुरुगन भगवान शिव के पुत्र कार्तिकेय का नाम है, जिन्हें तमिलनाडु में पूजा जाता है। भाजपा स्थानीय नेताओं के चेहरे के साथ चुनाव लड़ेगी, जबकि शीर्ष नेता प्रबंधन का काम संभालेंगे।
