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भारत और पाकिस्तान के बीच परमाणु प्रतिष्ठानों की वार्षिक सूची का आदान-प्रदान

भारत और पाकिस्तान ने अपने परमाणु प्रतिष्ठानों की वार्षिक सूची का आदान-प्रदान किया, जो तीन दशकों से चली आ रही परंपरा का हिस्सा है। यह समझौता दोनों देशों के बीच तनावपूर्ण संबंधों के बीच एक महत्वपूर्ण कदम है। विदेश मंत्रालय के अनुसार, यह प्रक्रिया नई दिल्ली और इस्लामाबाद में राजनयिक चैनलों के माध्यम से संपन्न हुई। इस समझौते का उद्देश्य परमाणु हमलों को रोकना और उच्च तनाव वाली स्थितियों में गलतफहमियों को कम करना है। जानें इस समझौते का इतिहास और इसके पीछे की महत्वपूर्ण बातें।
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भारत और पाकिस्तान के बीच परमाणु प्रतिष्ठानों की वार्षिक सूची का आदान-प्रदान

भारत-पाकिस्तान के बीच परमाणु समझौते का आदान-प्रदान

तीन दशकों से चली आ रही परंपरा को बनाए रखते हुए, भारत और पाकिस्तान ने द्विपक्षीय समझौते के तहत अपने परमाणु प्रतिष्ठानों की वार्षिक सूची का आदान-प्रदान किया। यह समझौता दोनों देशों को एक-दूसरे के परमाणु प्रतिष्ठानों पर हमले से रोकता है। यह महत्वपूर्ण आदान-प्रदान उस समय हुआ है जब जम्मू और कश्मीर के पहलगाम में हालिया आतंकी हमले के बाद मई 2025 में चार दिनों तक चले सैन्य संघर्ष के कारण दोनों देशों के संबंध बेहद तनावपूर्ण हो गए हैं।


सूची का आदान-प्रदान

विदेश मंत्रालय के अनुसार, यह प्रक्रिया नई दिल्ली और इस्लामाबाद में राजनयिक चैनलों के माध्यम से संपन्न हुई। मंत्रालय ने बताया कि यह आदान-प्रदान परमाणु प्रतिष्ठानों पर हमले को रोकने वाले समझौते के प्रावधानों के तहत हुआ। भारत और पाकिस्तान ने आज एक साथ अपने परमाणु प्रतिष्ठानों की सूची का आदान-प्रदान किया।


समझौते का इतिहास

यह समझौता 31 दिसंबर, 1988 को हस्ताक्षरित हुआ और 27 जनवरी, 1991 को लागू हुआ। इसके तहत, दोनों देशों को हर वर्ष की पहली जनवरी को अपने परमाणु प्रतिष्ठानों की जानकारी एक-दूसरे को देने का प्रावधान है। विदेश मंत्रालय ने कहा कि यह दोनों देशों के बीच सूचियों का 35वां आदान-प्रदान है। सुरक्षा विशेषज्ञ इस प्रक्रिया को एक महत्वपूर्ण विश्वास-निर्माण उपाय मानते हैं, जो संकट के समय आकस्मिक हमलों को रोकने में मदद करता है।


परमाणु जोखिम प्रबंधन

इस आदान-प्रदान के माध्यम से, दोनों पक्ष उच्च तनाव वाली सैन्य स्थितियों के दौरान गलतफहमियों के जोखिम को कम करने का प्रयास करते हैं। यहां तक कि परमाणु स्थल पर सामान्य हमले से भी विनाशकारी पर्यावरणीय और मानवीय प्रभाव उत्पन्न हो सकते हैं। यह आदान-प्रदान दक्षिण एशिया में परमाणु जोखिम प्रबंधन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।


भविष्य की चुनौतियाँ

यह प्रक्रिया कई तनावपूर्ण अध्यायों के दौरान भी जारी रही है, जैसे कि कारगिल संघर्ष, 2001-2002 की सैन्य तैनाती, 2016 का उरी हमला और 2019 का पुलवामा हमला।


समझौते की ऐतिहासिक जड़ें

यह समझौता 1980 के दशक के उत्तरार्ध में अस्तित्व में आया, जब भारत और पाकिस्तान दोनों ही परमाणु क्षमता हासिल करने की दिशा में अग्रसर थे। परमाणु बुनियादी ढांचे पर हमलों की आशंकाओं ने वार्ता को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह समझौता पड़ोसी देशों के बीच पहला औपचारिक परमाणु विश्वास-निर्माण उपायों में से एक था।