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भारत और विश्व की बदलती पहचान: डमरू और वैश्विक राजनीति

इस लेख में हम देखेंगे कि कैसे भारत और विश्व की पहचान बदल रही है। मंदिरों में उमड़ती भीड़, डमरू की गूंज और वैश्विक राजनीति में अमेरिका और चीन की भूमिका पर चर्चा की जाएगी। जानें कि कैसे ये घटनाएँ हमारे समय को प्रभावित कर रही हैं और भविष्य में क्या संभावनाएँ हैं।
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भारत और विश्व की बदलती पहचान: डमरू और वैश्विक राजनीति

भारत की नई पहचान

इस साल जनवरी के पहले पखवाड़े में, भारत और विश्व ने कई महत्वपूर्ण घटनाओं का सामना किया। मंदिरों में हिंदुओं की भीड़ ने एक नई पहचान बनाई है, जो अब डमरू और बछड़े के साथ जुड़ी हुई है। पहले भारत की पहचान सांप-सपेरों से थी, लेकिन अब यह आस्था और उत्सवों से भरी हुई है।


आज का युग राजा के डमरू और झांकियों का है। लोग गंगा स्नान और मंदिरों की ओर बढ़ रहे हैं, भले ही गंगा में प्रदूषण हो। एक समय विवेकानंद ने भारत का वैश्विक संदेश दिया था, और अब सेनापति अजित डोवाल ने युवाओं को जागरूक किया है।


वैश्विक राजनीति में बदलाव

समय के साथ, भारत ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया भी बदलाव के दौर से गुजर रही है। ग्रीनलैंड में नाटो के सैनिकों की तैनाती ने एक नई स्थिति उत्पन्न की है। अमेरिका के राष्ट्रपति ने ग्रीनलैंड पर अपना अधिकार जताया है, जिससे नाटो के अन्य देश भी चिंतित हैं।


डोनाल्ड ट्रंप ने 48 साल पुरानी इस्लामी धर्मसत्ता को हिला दिया है, और कोई भी देश उनके खिलाफ खड़ा नहीं हो सका। यह साबित होता है कि शक्ति का संतुलन किस तरह से बदल रहा है।


अमेरिका की शक्ति और चुनौतियाँ

इस पखवाड़े, ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका ने वैश्विक व्यापार में चीन की बढ़ती ताकत को चुनौती दी है। चीन ने विदेश व्यापार से इतना मुनाफा कमाया है, जो भारत की जीडीपी के एक तिहाई के बराबर है।


हाल ही में, स्पेसएक्स के क्रू-11 मिशन ने एक आपातकालीन स्थिति में अंतरिक्ष से सुरक्षित वापसी की, जो अमेरिका की तकनीकी क्षमता को दर्शाता है।


अमेरिका की आंतरिक चुनौतियाँ

हालांकि अमेरिका की स्थिति भी स्थिर नहीं है। वहां के आंतरिक मुद्दे और संकट भविष्य के लिए खतरे का संकेत देते हैं। लेकिन अमेरिका की तकनीकी क्षमता और संसाधन उसे एक मजबूत स्थिति में बनाए रखते हैं।