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भारत की अंतरिक्ष तकनीक में नया अध्याय: आयुलसात सैटेलाइट का लॉन्च

भारत का आयुलसात सैटेलाइट लॉन्च एक महत्वपूर्ण तकनीकी उपलब्धि है, जो देश को अंतरिक्ष में सैटेलाइट रीफ्यूलिंग की क्षमता प्रदर्शित करने वाले देशों में शामिल कर सकता है। यह मिशन न केवल भारत की स्पेस इंडस्ट्री को नई पहचान दिला सकता है, बल्कि महंगे सैटेलाइट्स की उम्र बढ़ाने में भी मददगार साबित हो सकता है। जानें इस मिशन के महत्व और इसके संभावित प्रभावों के बारे में।
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भारत की अंतरिक्ष तकनीक में नया अध्याय: आयुलसात सैटेलाइट का लॉन्च

भारत की नई तकनीकी उपलब्धि


नई दिल्ली: बेंगलुरु से अंतरिक्ष में उड़ान भरने वाला एक छोटा सैटेलाइट भारत को उन चुनिंदा देशों में शामिल कर सकता है, जिन्होंने अपने सैटेलाइट को पुनः ईंधन भरने की क्षमता प्रदर्शित की है। जब आयुलसात, जिसका वजन 25 किलोग्राम है, सोमवार को इसरो के PSLV-C62 रॉकेट के माध्यम से लॉन्च होगा, तो यह भारत के लिए एक महत्वपूर्ण तकनीकी प्रगति का प्रतीक होगा।


चीन के बाद भारत की नई उपलब्धि

इस मिशन की सफलता भारत को चीन के बाद दूसरा ऐसा देश बना सकती है, जिसने ऑर्बिट में सैटेलाइट रीफ्यूलिंग तकनीक का प्रदर्शन किया है। चीन ने पिछले वर्ष इस तकनीक का प्रयोग किया था, लेकिन इसके बारे में जानकारी सीमित रही। अमेरिका सहित अन्य अंतरिक्ष शक्तियों ने अभी तक इस तकनीक का सार्वजनिक प्रदर्शन नहीं किया है।


आयुलसात का उद्देश्य

आयुलसात किसी अन्य सैटेलाइट में ईंधन भरने का प्रदर्शन नहीं करेगा, बल्कि इसे एक लक्ष्य सैटेलाइट के रूप में विकसित किया गया है। इसका मुख्य उद्देश्य अंतरिक्ष में ईंधन ट्रांसफर की प्रक्रिया का परीक्षण करना है। यह मिशन पहले चरण में एक ही सैटेलाइट के भीतर ईंधन भरने की तकनीक का परीक्षण करेगा, जिससे वैज्ञानिक यह जान सकेंगे कि माइक्रोग्रैविटी में तरल ईंधन कैसे व्यवहार करता है।


लॉन्च के बाद का परीक्षण

ऑर्बिटएड के संस्थापक और सीईओ सख्तिकुमार आर ने बताया कि लॉन्च के चार घंटे के भीतर पहली बार ईंधन भरने की प्रक्रिया शुरू होने की उम्मीद है। यह परीक्षण भविष्य में सैटेलाइट्स को उनकी उम्र पूरी होने से पहले रिटायर करने की आवश्यकता को समाप्त कर सकता है, जिससे उन्हें ऑर्बिट में ही पुनः सक्रिय किया जा सकेगा।


भारत के लिए महत्व

आयुलसात मिशन भारत को सैटेलाइट सर्विसिंग और रीफ्यूलिंग जैसी अत्याधुनिक तकनीकों में आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यदि यह प्रयोग सफल होता है, तो इससे भारत की स्पेस इंडस्ट्री को नई वैश्विक पहचान मिल सकती है और महंगे सैटेलाइट्स की उम्र भी बढ़ाई जा सकेगी।