भारत की कूटनीति: ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक में संतुलन की भूमिका
ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक में भारत की कूटनीति
हाल ही में आयोजित ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक में, भले ही पश्चिम एशिया के संकट पर सभी सदस्य देशों के बीच एकमत नहीं हो पाया, लेकिन भारत ने अध्यक्षीय बयान के माध्यम से संतुलित और परिपक्व कूटनीति का परिचय दिया। भारत ने ईरान और संयुक्त अरब अमीरात जैसे विरोधी पक्षों के बीच संवाद, कूटनीति, संप्रभुता, ऊर्जा सुरक्षा और वैश्विक स्थिरता के महत्वपूर्ण पहलुओं को ध्यान में रखते हुए संतुलन साधने का प्रयास किया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव और ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची से अलग-अलग मुलाकात कर ऊर्जा कूटनीति को भी मजबूती प्रदान की। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल और विदेश मंत्री डॉ. एस जयशंकर ने भी ईरानी नेतृत्व से बातचीत कर भारत की सुरक्षा चिंताओं को प्रमुखता से उठाया।
भारत ने होर्मुज जलडमरूमध्य में अपने करीब एक दर्जन जहाजों के फंसे होने और समुद्री व्यापार मार्गों पर बढ़ते खतरों को लेकर गंभीर चिंता जताई। बैठक के दौरान, नई दिल्ली ने एक बार फिर वैश्विक कूटनीति के केंद्र में अपनी स्थिति को मजबूत किया। भारत ने पश्चिम एशिया में संघर्ष, ईरान और संयुक्त अरब अमीरात के बीच मतभेद, संयुक्त राष्ट्र सुधार, वैश्विक व्यापार व्यवस्था और बहुपक्षवाद जैसे मुद्दों पर संतुलित भूमिका निभाई।
हालांकि, ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की दो दिवसीय बैठक में पश्चिम एशिया के संघर्ष पर सहमति नहीं बन सकी, विशेष रूप से ईरान और संयुक्त अरब अमीरात के अलग-अलग रुख के कारण। इसके बावजूद, भारत ने अध्यक्षीय वक्तव्य जारी कर सभी पक्षों की चिंताओं को ध्यान में रखते हुए संतुलित रुख अपनाने का प्रयास किया।
भारत की कूटनीतिक चुनौतियाँ
भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि वह ईरान और संयुक्त अरब अमीरात दोनों के साथ अपने संबंधों को संतुलित बनाए रखे। ईरान ने हाल के दिनों में अमेरिका और इजराइल के हमलों की निंदा करते हुए ब्रिक्स की ओर से साझा बयान जारी करने की पहल भारत से करने का आग्रह किया था। दूसरी ओर, संयुक्त अरब अमीरात का रुख अलग था। भारत ने किसी भी पक्ष का खुला समर्थन करने से बचते हुए ऊर्जा ढांचे पर हमलों, प्रतिबंधों और क्षेत्रीय अस्थिरता के वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर चिंता जताई।
विदेश मंत्री डॉ. एस जयशंकर ने बैठक के दौरान वैश्विक शासन व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि वर्तमान विश्व व्यवस्था तेजी से बदल रही है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं अब भी पुराने ढांचे पर आधारित हैं। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार, एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका को अधिक प्रतिनिधित्व देने की आवश्यकता पर बल दिया।
जयशंकर ने कहा कि बहुपक्षवाद को प्रभावी बनाए रखने के लिए सुधार अब अनिवार्यता बन चुका है। उन्होंने वैश्विक आर्थिक चुनौतियों, आपूर्ति श्रृंखला की कमजोरियों, खाद्य और ऊर्जा सुरक्षा पर बढ़ते दबाव तथा विकासशील देशों की आवश्यकताओं को देखते हुए अंतरराष्ट्रीय वित्तीय ढांचे में व्यापक सुधार की आवश्यकता पर भी बल दिया।
प्रधानमंत्री मोदी की द्विपक्षीय वार्ताएँ
ब्रिक्स बैठक के दौरान, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची से मुलाकात की। यह भारत और ईरान के बीच संघर्ष के बाद पहली उच्चस्तरीय कूटनीतिक बातचीत मानी जा रही है। दोनों नेताओं ने क्षेत्रीय हालात और द्विपक्षीय संबंधों पर चर्चा की। इसके अलावा, ईरानी विदेश मंत्री ने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल से भी बातचीत की।
प्रधानमंत्री मोदी ने रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव से भी मुलाकात की, जिसमें यूक्रेन और पश्चिम एशिया की स्थिति सहित कई महत्वपूर्ण वैश्विक मुद्दों पर चर्चा हुई। मोदी ने सभी संघर्षों के शांतिपूर्ण समाधान के लिए भारत के समर्थन को दोहराया और रूस के साथ विशेष रणनीतिक साझेदारी में प्रगति पर संतोष व्यक्त किया।
कुल मिलाकर, नई दिल्ली में आयोजित ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक ने यह संकेत दिया कि भारत मौजूदा वैश्विक संकटों के बीच संवाद, संतुलन और बहुपक्षीय सहयोग की नीति को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।
