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भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता: वैश्विक संकट में नैतिक साहस की आवश्यकता

भारत ने 1 जनवरी 2026 को ब्रिक्स की अध्यक्षता ग्रहण की, लेकिन वैश्विक संकट में नैतिक साहस की कमी दिखाई दी। इस लेख में अंतरराष्ट्रीय कानून, राजनीतिक इच्छाशक्ति और वैश्विक दक्षिण की भूमिका पर चर्चा की गई है। क्या भारत और अन्य देश इस संकट में आगे आएंगे? जानें इस महत्वपूर्ण विषय पर।
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भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता: वैश्विक संकट में नैतिक साहस की आवश्यकता

ब्रिक्स की अध्यक्षता और वैश्विक स्थिति

1 जनवरी 2026 को भारत ने ब्रिक्स की अध्यक्षता ग्रहण की। यह जिम्मेदारी ब्राजील से लेकर भारत को 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन का आयोजन करना था। विस्तारित ब्रिक्स अब विश्व की 40 प्रतिशत से अधिक जनसंख्या का प्रतिनिधित्व करता है।


ब्राजील ने हमलों की संयुक्त निंदा के लिए तैयार रहने का संकेत दिया था, जबकि दक्षिण अफ्रीका ने भी इसी तरह का रुख अपनाया। चीन और रूस अपने रणनीतिक कारणों से सहमत थे। नए सदस्य जैसे ईरान, मिस्र और इथियोपिया भी इसी दिशा में झुके हुए थे। लेकिन भारत इस मामले में पीछे रह गया।


अंतरराष्ट्रीय कानून और राजनीतिक इच्छाशक्ति

जब बम गिर रहे हों और स्कूलों का ढांचा ध्वस्त हो रहा हो, तब किसी नेता का गोल्फ खेलना केवल असंवेदनशीलता नहीं, बल्कि उसकी असंवेदनशीलता का प्रमाण है। यह दर्शाता है कि अंतरराष्ट्रीय व्यवस्थाएँ अपनी नैतिक शक्ति और अधिकार खो चुकी हैं।


अब यह सवाल नहीं है कि अमेरिका और इज़राइल ने अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन किया या नहीं, बल्कि यह है कि क्या दुनिया में कानून लागू करने की राजनीतिक इच्छाशक्ति है।


संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की विफलता

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद एक समझौते पर आधारित संस्था थी, जिसका उद्देश्य महाशक्तियों को नियंत्रित करना था। लेकिन अब यह संतुलन टूट चुका है। परिषद ने ईरान की निंदा करने वाला प्रस्ताव पारित किया, जबकि नागरिक ढांचे को नष्ट करने वाले देशों की आलोचना नहीं की।


यह केवल प्रक्रियात्मक विफलता नहीं थी, बल्कि यह व्यवस्था का आत्म-स्वीकार था। परिषद ने खुद को उजागर कर दिया और इसी समय दुनिया के सामने संकट और जिम्मेदारी खड़ी हो गई।


भारत की अनुपस्थिति और वैश्विक नेतृत्व का अवसर

भारत को इस संकट में आगे आना चाहिए था, लेकिन वह सबसे स्पष्ट रूप से अनुपस्थित रहा। नई दिल्ली की गणना स्पष्ट थी, वॉशिंगटन के साथ बढ़ते संबंधों ने उस मंच की जिम्मेदारी से अधिक महत्व पा लिया।


जिस क्षण नैतिक साहस की आवश्यकता थी, भारत ने सुविधा को चुना। परिणामस्वरूप, ब्रिक्स कोई संयुक्त वक्तव्य जारी नहीं कर सका।


कानून और राजनीतिक इच्छाशक्ति का संकट

इस युद्ध में कानून स्पष्ट है, लेकिन अनुपस्थित है राजनीतिक इच्छाशक्ति। यदि कोई राज्य अंतरराष्ट्रीय न्यायालय की कार्यवाही के बीच भी सैन्य अभियान जारी रख सकता है, तो यह संदेश साफ है कि अंतरराष्ट्रीय कानून कमजोरों पर लागू होता है।


आठ दशकों में बनाए गए नियम धीरे-धीरे कमजोर पड़ सकते हैं, और यह केवल एक नाटकीय घटना से नहीं, बल्कि लगातार बिना दंड के होने वाले उल्लंघनों से होगा।


वैश्विक दक्षिण की भूमिका

वैश्विक दक्षिण एकरूप नहीं है, लेकिन उसके पास दुनिया की बहुसंख्या और बढ़ती आर्थिक शक्ति है। अब समय है कि वह समन्वय और साहस के साथ आगे आए।


दुनिया दंडमुक्ति को वित्त नहीं देगी। एक मानवीय युद्धविराम की मांग हर मंच से उठनी चाहिए।


निष्कर्ष

बीसवीं सदी की संस्थाएँ कमजोर पड़ रही हैं। इक्कीसवीं सदी की जिम्मेदारी अब उन देशों पर है जो मानते हैं कि कानून का अर्थ तभी है जब वह सबकी रक्षा करे।


दुनिया प्रतीक्षा कर रही है कि क्या वैश्विक दक्षिण आगे आएगा और अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के मूल वादे की रक्षा करेगा।