भारत की राजनीति में हेले और अभिजित का उभरता प्रभाव
हेले और अभिजित: एक नई राजनीतिक चर्चा का आरंभ
क्या आप सोच सकते हैं कि एक छोटे से कंकर का प्रभाव हमारे विशाल संसार में इतना बड़ा हो सकता है? इसका कारण कहीं न कहीं हमारी सूखी और प्रणालीगत धरती में छिपा है। थोड़ी सी नमी मिलते ही ये अंकुरित हो जाते हैं।
भारत की राजनीति इस समय एक दिलचस्प मोड़ पर है। दो अनोखे लेकिन महत्वपूर्ण घटनाक्रमों ने वैश्विक सामाजिक-राजनीतिक संवाद के विशेषज्ञों को चौंका दिया है। एक घटना में, नार्वे की पत्रकार हेले लिंग ने अचानक से वैश्विक मीडिया में सुर्खियाँ बटोरीं। दूसरी ओर, अभिजित दीपके ने अपने डिजिटल राजनीतिक दल 'काकरोच जनता पार्टी' की स्थापना के चलते चर्चा का विषय बन गए। हेले की उम्र 28 वर्ष है, जबकि अभिजित 30 वर्ष के हैं।
हेले ने नरेंद्र मोदी की नॉर्वे यात्रा के दौरान एक संवाददाता सम्मेलन में प्रधानमंत्री से सवाल पूछने का प्रयास किया। जब मोदी बिना जवाब दिए चले गए, तो हेले उनके पीछे दौड़ीं। बाद में, भारतीय विदेश मंत्रालय के सचिव सिबी जॉर्ज ने उन्हें सवाल पूछने का अवसर दिया और लगभग 16 मिनट तक भारत के मूल्यों और परंपराओं पर एक व्याख्यान दिया।
हेले के सवाल पूछने के प्रयास के बाद, भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के समर्थकों ने उन पर हमले शुरू कर दिए। कई टीवी एंकरों ने उन्हें 'नन्ही-मुन्नी' और 'टिकटॉक-पत्रकार' कहकर संबोधित किया। इसके अलावा, उन्हें विदेशी जासूस और चीन समर्थक भी घोषित किया गया।
इस विवाद के परिणामस्वरूप, हेले के ट्विटर फॉलोअर्स की संख्या अचानक बढ़कर एक लाख के पार पहुँच गई। हालांकि, उनके फेसबुक और इंस्टाग्राम अकाउंट अस्थायी रूप से निलंबित हो गए हैं। इस घटना ने भारतीय मीडिया में व्यापक चर्चा को जन्म दिया है।
अभिजित दीपके, जो औरंगाबाद के निवासी हैं, ने हाल ही में 'कॉकरोच जनता दल' का गठन किया। उन्होंने एक साधारण गूगल फॉर्म के माध्यम से सदस्यता अभियान शुरू किया, जिससे उनकी सदस्य संख्या रातोंरात एक लाख के पार पहुँच गई।
अभिजित वर्तमान में अमेरिका में हैं और उन्हें लगता है कि भारत लौटने पर उन्हें तिहाड़ जेल भेजा जा सकता है। यह सवाल उठता है कि एक 'व्यंग्यात्मक डिजिटल आंदोलन' को इतना समर्थन क्यों मिल रहा है। क्या यह वर्तमान राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्था के प्रति गहरी निराशा का संकेत है?
हेले और अभिजित की मासूमियत पर सवाल उठाए जा सकते हैं, लेकिन यह सोचने की बात है कि कैसे एक छोटा सा कंकर भी हमारे राजनीतिक महासागर में इतना बड़ा तूफान पैदा कर सकता है।
