भारत में असहमति की आवाज़ों का दमन: लोकतंत्र की चुनौतियाँ
असहमति का महत्व
मार्क्स के द्वंद्वात्मक भौतिकवाद का सिद्धांत इस विचार पर आधारित है कि कोई भी विचार पूर्ण नहीं होता। जैसे ही एक विचार प्रकट होता है, उसका प्रतिविचार भी सामने आता है। इन दोनों के बीच टकराव से एक नया विचार जन्म लेता है, और यह प्रक्रिया निरंतर चलती रहती है। लोकतंत्र का सिद्धांत भी इसी से जुड़ा है। कोई भी सरकार पूर्ण नहीं होती और उसके निर्णय हमेशा सही नहीं होते। इसलिए, जनता सरकार के साथ-साथ विपक्ष का भी चुनाव करती है, जिसका कार्य सरकार को जवाबदेह बनाना है।
सरकार और विपक्ष की भूमिका
विपक्ष को सरकार की नीतियों या निर्णयों में कमियों को उजागर करना चाहिए, बिना किसी भय या संकोच के अपनी असहमति व्यक्त करनी चाहिए। सरकार का कर्तव्य है कि वह असहमति की आवाज़ों को सम्मान के साथ सुने। यह स्वीकार करना चाहिए कि असहमत होना शत्रुता नहीं है। यदि असहमति की आवाज़ सही है, तो उसे स्वीकार करने का साहस होना सबसे बड़ा गुण है। यदि किसी सरकार में यह गुण है, तो उसे सबसे लोकतांत्रिक माना जाएगा।
असहमति का दमन
हाल के समय में भारत में असहमति की आवाज़ों को शत्रु माना जाने लगा है। सरकार के खिलाफ हर प्रदर्शन को विदेशी साजिश करार दिया जा रहा है। हर विरोध प्रदर्शन को देशद्रोही टूलकिट की साजिश बताया जा रहा है। असहमति रखने वाले व्यक्तियों की साख को बिगाड़ने और उनकी निष्ठा को संदिग्ध बनाने का प्रयास किया जा रहा है।
प्रदर्शन के तरीके पर सवाल
हाल ही में, दिल्ली के भारत मंडपम में इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट 2026 के दौरान यूथ कांग्रेस के कुछ नेताओं ने कपड़े उतारकर प्रदर्शन किया। इस प्रदर्शन की आलोचना की गई, और कई सहयोगी पार्टियों ने भी सवाल उठाए। हालांकि, क्या इस आधार पर यूथ कांग्रेस को देशद्रोही कहना उचित है? प्रदर्शन का तरीका गलत था, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि वे देश के विरोधी हैं।
वैश्विक परिप्रेक्ष्य
दुनिया के अन्य देशों में भी प्रदर्शन होते हैं, लेकिन वहां की सरकारें इसे साजिश नहीं मानतीं। उदाहरण के लिए, पेरिस में जलवायु परिवर्तन सम्मेलन के दौरान पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने नग्न होकर प्रदर्शन किया, लेकिन किसी नेता ने इसे देश की छवि खराब करने के रूप में नहीं देखा। भारत में, हालांकि, हर असहमति को साजिश और देशद्रोह कहा जा रहा है।
लोकतंत्र की चुनौतियाँ
भारत मंडपम में कांग्रेस के प्रदर्शन के बाद सरकार की प्रतिक्रिया असहमति की आवश्यकता से इनकार करने का संकेत है। यदि विपक्ष को सरकार की कोई बात सहमत नहीं लगती, तो सरकार को भी विपक्ष की आलोचना सुनने में कठिनाई होती है। यह स्थिति लोकतंत्र के लिए चिंताजनक है।
