मंत्रिमंडल गठन में देरी: भाजपा की नई परंपरा?
मंत्रिमंडल गठन की स्थिति
दिल्ली में इस समय पश्चिम बंगाल और असम में मंत्रिमंडल गठन की प्रक्रिया पर कोई चर्चा नहीं हो रही है। उदाहरण के लिए, केरल में कांग्रेस को अपने नेता का चयन करने में कुछ अतिरिक्त समय लगा था। जब भाजपा ने असम में अपने नेता का चयन किया, उसके दो दिन बाद कांग्रेस ने केरल में अपने नेता का नाम घोषित किया। लेकिन मीडिया का ध्यान इस बात पर था कि कांग्रेस नेता का चयन नहीं कर पा रही है। जब अंततः नेता का चयन हुआ, तो मुख्यमंत्री के साथ 21 सदस्यों का पूरा मंत्रिमंडल शपथ ग्रहण कर चुका था। शपथ लेने से एक दिन पहले, मनोनीत मुख्यमंत्री वीडी सतीशन ने सभी मंत्रियों के नामों की घोषणा की और सूची राज्यपाल को सौंप दी। कुल 21 मंत्री बनाए गए हैं और सभी ने शपथ ली है, जिसके बाद विभागों का बंटवारा भी हो गया है।
पश्चिम बंगाल और असम की स्थिति
इसके विपरीत, पश्चिम बंगाल में 9 मई को मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने शपथ ली थी, लेकिन उनके साथ केवल चार मंत्रियों ने शपथ ली। भाजपा ने इस प्रक्रिया में इतनी गोपनीयता रखी कि मंच पर शपथ लेने तक किसी को नहीं पता था कि कौन मंत्री बन रहा है। शपथ के समय ही यह जानकारी सामने आई। 13 दिन बीत जाने के बाद भी बाकी मंत्रियों की शपथ नहीं हुई है। राज्य में कुल 44 मंत्री हो सकते हैं, लेकिन केवल छह लोग काम कर रहे हैं, जिसमें मुख्यमंत्री अकेले 42 विभागों का प्रबंधन कर रहे हैं। इस पर कोई सवाल नहीं उठ रहा है।
असम और बिहार में मंत्रिमंडल गठन
असम में 13 मई को मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने शपथ ली थी, जिसमें चार अन्य लोगों ने भी शपथ ली, जिनमें से दो सहयोगी पार्टियों के नेता हैं। वहां भी नौ दिन बीत चुके हैं, लेकिन मंत्रिमंडल का गठन नहीं हुआ है। असम में 18 मंत्री हो सकते हैं, लेकिन सरकार केवल पांच लोगों द्वारा चल रही है। इसी तरह, बिहार में भी सम्राट चौधरी के नेतृत्व में सरकार बनी, लेकिन 22 दिन तक केवल तीन लोगों ने ही सरकार चलाई। इसके बाद मंत्रिमंडल का विस्तार हुआ। केरल के बाद तमिलनाडु में भी मंत्रिमंडल का गठन हो चुका है। यह प्रतीत होता है कि भाजपा एक नई परंपरा की शुरुआत कर रही है। यह कहना मुश्किल है कि क्या किसी विवाद के कारण यह देरी हो रही है, क्योंकि भाजपा में अब विवाद, मतभेद और अंदरूनी खींचतान लगभग समाप्त हो चुकी है।
