Newzfatafatlogo

महिला आरक्षण कानून में बदलाव की कमी से नाराजगी का असर सीमित

महिला आरक्षण के लिए प्रस्तावित नारी शक्ति वंदन कानून में बदलाव न होने से महिलाओं की नाराजगी का असर सीमित रहने की संभावना है। भाजपा के नेताओं का मानना है कि इससे महिलाएं नाराज होंगी, लेकिन इस धारणा पर अन्य लोगों का विश्वास नहीं है। चुनावी राजनीति में महिलाओं की भूमिका और उनके मतदान व्यवहार पर इस कानून का प्रभाव जानें।
 | 
महिला आरक्षण कानून में बदलाव की कमी से नाराजगी का असर सीमित

महिला आरक्षण कानून पर चर्चा

महिला आरक्षण के लिए प्रस्तावित नारी शक्ति वंदन कानून में कोई बदलाव नहीं किया जा सका, जिससे विधानसभाओं और लोकसभा में महिलाओं को आरक्षण मिलने का मार्ग अवरुद्ध हो गया है। भाजपा के नेताओं का मानना है कि इससे महिलाएं नाराज होंगी, लेकिन इस धारणा पर अन्य लोगों का विश्वास नहीं है। वास्तव में, भाजपा के स्वयं के सदस्य भी इस पर संदेह करते हैं, लेकिन वे इसे इसलिए कह रहे हैं क्योंकि उन्हें ऐसा निर्देश दिया गया है। उनका मानना है कि इससे पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव में कुछ लाभ हो सकता है।


वास्तविकता यह है कि इस प्रकार की बातें चुनावी लाभ नहीं देतीं। विधानसभा और लोकसभा में चुनाव लड़ने की इच्छा रखने वाली कुछ महिलाएं निराश हो सकती हैं, लेकिन अधिकांश महिलाओं पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ता। यदि महिला आरक्षण कानून के विरोध का कोई असर होता, तो मुलायम सिंह यादव, लालू यादव और शरद यादव जैसे नेता चुनाव नहीं जीत पाते। कांग्रेस और भाजपा ने पिछले तीन दशकों में कई बार इस बिल को बाधित किया है। कांग्रेस ने अमेरिका के साथ परमाणु संधि के लिए पूरी सरकार को दांव पर लगाया, लेकिन महिला आरक्षण को पास नहीं करा सकी।


यह सच है कि महिलाएं अब एक स्वतंत्र वोटर के रूप में उभरी हैं, लेकिन उनके मतदान पर अधिक प्रभाव उन योजनाओं का होता है, जिनमें उन्हें नकद सहायता या जीवन को सरल बनाने वाली सुविधाएं मिलती हैं। यदि ऐसी योजनाएं बंद की जाती हैं, तो उनकी प्रतिक्रिया चुनावों में दिखाई दे सकती है। महिला आरक्षण कानून का उनके मतदान व्यवहार पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।