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मिडिल ईस्ट तनाव से भारतीय रसोई पर महंगाई का असर

मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव का असर अब भारतीय रसोई पर भी पड़ने लगा है, जहां खाने के तेल की कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं। हाल के आंकड़ों के अनुसार, पिछले एक महीने में सूरजमुखी और पाम ऑयल की कीमतों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। भारत में कुकिंग ऑयल की मांग तेजी से बढ़ रही है, लेकिन घरेलू उत्पादन उस गति से नहीं बढ़ पा रहा है। सरकार ने इस स्थिति को नियंत्रित करने के लिए कई उपाय किए हैं, लेकिन आम आदमी की जेब पर इसका सीधा असर पड़ रहा है।
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मिडिल ईस्ट तनाव से भारतीय रसोई पर महंगाई का असर

महंगाई का असर: खाने के तेल की कीमतें बढ़ रही हैं

नई दिल्ली: मिडिल ईस्ट में बढ़ते युद्ध और तनाव का प्रभाव अब भारतीय रसोई तक पहुंच चुका है। इस बार महंगाई केवल पेट्रोल-डीजल या एलपीजी गैस तक सीमित नहीं है, बल्कि किचन में आवश्यक खाद्य तेल भी तेजी से महंगा हो रहा है। भारत में सुबह के नाश्ते में पराठे, बाजार में बिकने वाले समोसे और जलेबी, या रोजमर्रा की सब्जियों में कुकिंग ऑयल का भरपूर उपयोग होता है। ऐसे में खाने के तेल की बढ़ती कीमतें आम आदमी की जेब पर भारी पड़ रही हैं और घरेलू बजट को प्रभावित कर रही हैं।


एक महीने में कुकिंग ऑयल की कीमतों में भारी वृद्धि

बाजार के आंकड़ों के अनुसार, पिछले एक महीने में खाने के तेल की कीमतों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। 24 फरवरी से 24 मार्च 2026 के बीच सूरजमुखी (सनफ्लावर) तेल की कीमत 175 रुपये से बढ़कर 181 रुपये प्रति किलो हो गई है। इसी तरह, पाम ऑयल की कीमत 5 रुपये बढ़कर 141 रुपये प्रति किलो हो गई है। सोयाबीन तेल की कीमत में भी 4 रुपये प्रति किलो की वृद्धि हुई है, जबकि मूंगफली, वनस्पति और सरसों तेल के दाम लगभग 3 रुपये प्रति किलो तक बढ़ गए हैं।


भारत की बढ़ती खपत और आयात पर निर्भरता

भारत में खाने के तेल का महत्व केवल स्वाद तक सीमित नहीं है, बल्कि यह शरीर को आवश्यक फैट, ऊर्जा और पोषण प्रदान करने का एक महत्वपूर्ण स्रोत है। देश में कुकिंग ऑयल की मांग तेजी से बढ़ रही है, लेकिन घरेलू उत्पादन उस गति से नहीं बढ़ पा रहा है। 2022-23 के आंकड़ों के अनुसार, शहरी भारत में एक व्यक्ति सालाना औसतन 12 किलो और ग्रामीण क्षेत्रों में लगभग 11 किलो तेल की खपत करता है। इस विशाल मांग को पूरा करने के लिए भारत को अपनी जरूरत का लगभग 56 प्रतिशत तेल विदेशों से आयात करना पड़ता है, जबकि केवल 44 प्रतिशत हिस्सा घरेलू उत्पादन से आता है।


आयात का बढ़ता बिल और पाम ऑयल का प्रमुख हिस्सा

आयात के आंकड़े इस निर्भरता को स्पष्ट करते हैं। 2017 में भारत ने 11.8 अरब डॉलर का खाने का तेल आयात किया था, जो 2022 में बढ़कर 21.1 अरब डॉलर तक पहुंच गया। हालांकि, 2025 में यह आंकड़ा थोड़ा घटकर 18.6 अरब डॉलर रहा। भारत द्वारा आयात किए जाने वाले कुल तेल में सबसे बड़ी हिस्सेदारी पाम ऑयल की है, जो 41 प्रतिशत है। इसके बाद सोयाबीन तेल 35 प्रतिशत और सूरजमुखी तेल 18 प्रतिशत के साथ आता है।


सरकार का आश्वासन: सप्लाई पर कोई खतरा नहीं

कीमतों में वृद्धि के बीच, सरकार ने जनता को आश्वस्त किया है कि ईरान-इजरायल तनाव के बावजूद भारत में तेल की सप्लाई पर कोई बड़ा खतरा नहीं है। भारत केवल एक देश पर निर्भर नहीं है, बल्कि मलेशिया, इंडोनेशिया और अमेरिका जैसे कई देशों से तेल आयात करता है। यदि किसी एक स्थान से सप्लाई प्रभावित होती है, तो अन्य विकल्प उपलब्ध हैं। इसके साथ ही, विदेशी निर्भरता को कम करने और आत्मनिर्भरता बढ़ाने के लिए सरकार ने 'नेशनल मिशन ऑन एडिबल ऑयल्स-ऑयलसीड्स' की शुरुआत की है, जिसका उद्देश्य आने वाले वर्षों में देश में तिलहन और तेल का उत्पादन बढ़ाना है।