मेनका गुरुस्वामी का राज्यसभा में ऐतिहासिक प्रवेश
नई दिल्ली में एक नया अध्याय
नई दिल्ली: आज भारतीय राजनीति में एक महत्वपूर्ण मोड़ आया, जब सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ वकील मेनका गुरुस्वामी ने राज्यसभा के सदस्य के रूप में शपथ ली। वे न केवल अपनी कानूनी विशेषज्ञता के लिए जानी जाती हैं, बल्कि वे भारत की पहली सांसद हैं जिन्होंने सार्वजनिक रूप से अपनी LGBTQ पहचान को साझा किया है। पश्चिम बंगाल की सत्ताधारी पार्टी तृणमूल कांग्रेस (TMC) से चुनी गईं गुरुस्वामी का संसद में प्रवेश लैंगिक विविधता और समावेशी शासन की दिशा में एक महत्वपूर्ण बदलाव का संकेत है।
कानूनी विशेषज्ञता और सामाजिक न्याय की प्रतिबद्धता
मेनका गुरुस्वामी उन चुनिंदा वकीलों में से एक हैं, जिन्होंने LGBTQ समुदाय के अधिकारों को कानूनी मान्यता दिलाने के लिए संघर्ष किया है और धारा 377 जैसे संवैधानिक मुद्दों पर महत्वपूर्ण लड़ाई लड़ी है। विशेषज्ञों का मानना है कि उनकी कानूनी विशेषज्ञता और सामाजिक न्याय के प्रति उनकी प्रतिबद्धता से विधायी चर्चाओं और नीति निर्माण में एक नया दृष्टिकोण देखने को मिलेगा। संसद के ऊपरी सदन में उनकी उपस्थिति उन आवाजों को मजबूती प्रदान करेगी, जो अब तक हाशिए पर रही हैं।
शिक्षा और करियर की उत्कृष्टता
शिक्षा और करियर की शानदार पृष्ठभूमि
किरण मनराल की पुस्तक 'राइजिंग: 30 विमेन हू चेंज्ड इंडिया' के अनुसार, गुरुस्वामी ने 1997 में पूर्व अटॉर्नी जनरल अशोक देसाई के मार्गदर्शन में अपने करियर की शुरुआत की। शिक्षा के क्षेत्र में भी उनका रिकॉर्ड अत्यंत प्रभावशाली है। उन्होंने ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से बीसीएल (BCL) और हार्वर्ड लॉ स्कूल से एलएलएम (LLM) की डिग्री प्राप्त की। 2019 में, उन्हें 'फॉरेन पॉलिसी' पत्रिका द्वारा दुनिया के 100 सबसे प्रभावशाली वैश्विक विचारकों की सूची में शामिल किया गया था।
टीएमसी के साथ उनका जुड़ाव
टीएमसी के साथ पुराना जुड़ाव
राजनीति में कदम रखने से पहले, उन्होंने कानूनी मोर्चे पर तृणमूल कांग्रेस का प्रतिनिधित्व किया है। उन्होंने आई-पैक (I-PAC) के कार्यालयों पर प्रवर्तन निदेशालय (ED) की छापेमारी के खिलाफ अदालत में पार्टी का मजबूती से पक्ष रखा। अब एक सांसद के रूप में, उनकी भूमिका केवल अदालती दलीलों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि वे देश के कानून निर्माण की प्रक्रिया में सक्रिय रूप से भाग लेंगी।
