राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस की चुनौतियाँ और रणनीतियाँ
राज्यसभा चुनाव का पहला चरण
इस वर्ष के राज्यसभा के द्विवार्षिक चुनाव का पहला चरण संपन्न हो चुका है। इस चरण में 10 राज्यों की 37 सीटों पर मतदान हुआ। इनमें से 26 सीटें सात राज्यों में निर्विरोध भरी गईं। असम भी उन राज्यों में शामिल है, जहां कांग्रेस एक सीट जीतने का प्रयास कर सकती थी, लेकिन उसने कोई ठोस कदम नहीं उठाया।
बाकी तीन राज्यों में 11 सीटों पर चुनाव हुआ, जिसमें कांग्रेस विधायकों की क्रॉस वोटिंग के कारण विपक्ष को दो सीटों का नुकसान हुआ। कांग्रेस ने किसी तरह से तीसरी सीट जीती। बिहार, ओडिशा और हरियाणा में कांग्रेस की स्थिति कमजोर नजर आई, और उसके नेताओं का प्रबंधन असफल साबित हुआ। राहुल गांधी ने बिहार में हाल ही में एक बैठक की थी, जिसमें छह विधायकों को दिल्ली बुलाया गया था। लेकिन चार महीने बीत जाने के बाद भी कांग्रेस इन विधायकों का नेता तय नहीं कर पाई।
बिहार में कांग्रेस की स्थिति
बिहार में राजद के अमरेंद्रधारी सिंह चुनावी मैदान में थे, और कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष अखिलेश प्रसाद सिंह ने कहा था कि अमरेंद्रधारी की जीत निश्चित है। लेकिन कांग्रेस के छह में से तीन विधायक मतदान के लिए नहीं पहुंचे। यह कोई अचानक की घटना नहीं थी, क्योंकि पहले से ही संकेत मिल रहे थे कि कुशवाहा, अति पिछड़ा और आदिवासी समुदाय के ये विधायक एनडीए के संपर्क में थे। फिर भी कांग्रेस प्रबंधन इस स्थिति को संभालने में असफल रहा।
कांग्रेस के प्रभारी कृष्णा अल्लावरू और प्रदेश अध्यक्ष राजेश राम, जो राहुल गांधी के करीबी माने जाते हैं, दोनों ने इस मामले में कोई ठोस कदम नहीं उठाया। प्रभारी तो बिहार गए ही नहीं।
ओडिशा और हरियाणा में कांग्रेस की चुनौतियाँ
ओडिशा में, कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष भक्त चरण दास ने नवीन पटनायक से एक सामान्य उम्मीदवार देने का प्रस्ताव रखा, लेकिन कांग्रेस के विधायकों ने क्रॉस वोटिंग कर दी। हरियाणा में, राहुल गांधी ने करमबीर बौद्ध को उम्मीदवार बनाया, लेकिन उन्हें जिताने में कांग्रेस प्रबंधकों को काफी मेहनत करनी पड़ी। पांच कांग्रेस विधायकों ने क्रॉस वोटिंग की और चार वोट अवैध हो गए। इसके बावजूद, बौद्ध की जीत आधे से कम वोटों से हुई।
