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श्रीलंका में ईरानी युद्धपोत पर अमेरिकी हमले से बढ़ा तनाव

श्रीलंका की संसद में ईरानी युद्धपोत पर अमेरिकी हमले के बाद गंभीर सवाल उठाए गए हैं। विपक्षी नेताओं ने सरकार से पूछा कि क्या ईरानी जहाज को श्रीलंका के जल क्षेत्र में प्रवेश की अनुमति देने में देरी की गई। इस घटना ने हिंद महासागर में बढ़ते सैन्य तनाव को उजागर किया है, जिससे वैश्विक व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति पर खतरा मंडरा रहा है। जानें इस घटनाक्रम के पीछे की पूरी कहानी और इसके संभावित प्रभाव।
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श्रीलंका में ईरानी युद्धपोत पर अमेरिकी हमले से बढ़ा तनाव

श्रीलंका की संसद में उठे गंभीर सवाल

गुरुवार को श्रीलंका की संसद में एक महत्वपूर्ण मुद्दा उठाया गया, जिसने हिंद महासागर में संभावित सैन्य टकराव की चिंताओं को उजागर किया। विपक्षी नेताओं ने सरकार से पूछा कि क्या ईरानी युद्धपोत, जो अमेरिकी हमले का शिकार बना, काफी समय से श्रीलंका के जल क्षेत्र में प्रवेश की अनुमति मांग रहा था। एसजेबी के सांसद मुजीबुर रहमान ने संसद में कहा कि ईरानी जहाज को गाले बंदरगाह से लगभग चालीस समुद्री मील दूर ग्यारह घंटे तक इंतजार करना पड़ा। उन्होंने यह भी बताया कि संघर्ष की स्थिति के कारण जहाज के लिए ईरान लौटना मुश्किल हो गया था और उसने श्रीलंका से शरण मांगी थी।


राजनीतिक विवाद और कूटनीतिक दबाव

रहमान ने यह भी सवाल उठाया कि क्या श्रीलंका सरकार ने अमेरिका और भारत के दबाव में जहाज को बंदरगाह में प्रवेश की अनुमति देने में देरी की। उन्होंने कहा कि जिस जहाज पर बाद में अमेरिकी पनडुब्बी ने हमला किया, वह कई घंटे तक श्रीलंका के जल क्षेत्र में प्रवेश की गुहार लगाता रहा। यह आरोप श्रीलंका में एक बड़े राजनीतिक और कूटनीतिक विवाद को जन्म दे चुका है, क्योंकि इस घटनाक्रम ने संकेत दिया है कि यह छोटा द्वीपीय देश अब वैश्विक शक्ति राजनीति के भंवर में फंस गया है।


अमेरिकी पनडुब्बी का हमला

यह विवाद तब भड़का जब बुधवार सुबह श्रीलंका के दक्षिणी तट के पास अमेरिकी पनडुब्बी ने ईरान के युद्धपोत डेना पर टारपीडो दागकर उसे समुद्र में डुबो दिया। यह जहाज भारत में आयोजित नौसैनिक अभ्यास में भाग लेने के बाद अपने देश लौट रहा था। गाले से लगभग चालीस समुद्री मील दूर यह हमला हुआ और कुछ ही समय में जहाज समुद्र की गहराइयों में समा गया।


अमेरिकी रक्षा मंत्री का बयान

अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने इस हमले की पुष्टि करते हुए कहा कि यह अमेरिकी सेना द्वारा किया गया था। यह बयान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह दूसरे विश्व युद्ध के बाद पहली बार है जब अमेरिका ने हिंद महासागर में किसी दुश्मन जहाज को निशाना बनाया है। इस हमले ने पूरे क्षेत्र में सैन्य और कूटनीतिक हलचल पैदा कर दी है।


बचाव अभियान और अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया

श्रीलंका को सुबह पांच बजकर आठ मिनट पर संकट संदेश मिला। जब निगरानी विमान घटनास्थल पर पहुंचे, तब तक जहाज पूरी तरह डूब चुका था। जहाज पर लगभग 180 नौसैनिक सवार थे। इसके बाद बचाव अभियान तेज किया गया, जिसमें कई देशों ने भाग लिया। भारत ने भी तुरंत सक्रियता दिखाते हुए खोज और बचाव अभियान में अपने संसाधन लगाए।


ईरान का दूसरा युद्धपोत

घटना के बाद ईरान का दूसरा युद्धपोत बुशेहर कई घंटों तक श्रीलंका के जल क्षेत्र के बाहर खड़ा रहा। यह जहाज श्रीलंका के विशेष आर्थिक क्षेत्र में पहुंच चुका था और बंदरगाह में प्रवेश की अनुमति का इंतजार कर रहा था। अंततः श्रीलंका के राष्ट्रपति अनुर कुमार दिसानायके ने घोषणा की कि जहाज के 208 कर्मियों को कोलंबो बंदरगाह पर उतारा जाएगा।


हिंद महासागर में बदलता शक्ति संतुलन

यह घटनाक्रम केवल एक सैन्य घटना नहीं है, बल्कि हिंद महासागर में बदलते शक्ति संतुलन का संकेत है। यदि अमेरिका और ईरान के बीच टकराव समुद्र में इसी तरह बढ़ता रहा, तो यह क्षेत्र वैश्विक व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति के लिए बड़ा खतरा बन सकता है।