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संघ शताब्दी: पारदर्शिता और शुद्धिकरण की चुनौतियाँ

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (RSS) अपने शताब्दी वर्ष में पारदर्शिता और संगठन के साथ राष्ट्र में बदलाव के लिए तत्पर है। सरसंघचालक मोहन भागवत ने दिल्ली में संवाद कार्यक्रम में कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा की। संघ ने पिछले सौ वर्षों में कई उतार-चढ़ाव देखे हैं और सामाजिक-सांस्कृतिक क्षेत्र में अपनी गतिविधियों को गोपनीय रखा है। इस लेख में संघ की गतिविधियों, इमरजेंसी के दौरान भूमिगत प्रचारकों की भूमिका, और वर्तमान में संघ की शाखाओं की संख्या में वृद्धि पर चर्चा की गई है।
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संघ शताब्दी: पारदर्शिता और शुद्धिकरण की चुनौतियाँ

संघ की शताब्दी वर्ष की उपलब्धियाँ


आलोक मेहता | राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (RSS) अपने शताब्दी वर्ष में अधिक सफल और पारदर्शी होने के साथ-साथ राष्ट्र में बदलाव के लिए तत्पर दिखाई दे रहा है। संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने दिल्ली में तीन दिवसीय संवाद कार्यक्रम में संघ से जुड़े कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर प्रकाश डाला। इनमें भाजपा और प्रधानमंत्री के साथ संबंध, उम्र विवाद, हिन्दू राष्ट्र, धार्मिक मान्यता, इस्लाम का अस्तित्व, और काशी-मथुरा आंदोलन जैसे विषय शामिल थे।


संघ ने पिछले सौ वर्षों में कई उतार-चढ़ाव देखे हैं और विभिन्न चुनौतियों का सामना किया है। सामाजिक और सांस्कृतिक क्षेत्र में लंबे समय तक काम करना कठिन होता है, जिससे इसे विश्व में एक अनूठा संगठन माना जा सकता है। दिलचस्प बात यह है कि संघ ने वर्षों तक अपनी गतिविधियों को गोपनीय रखा और प्रचारित करने से दूर रहा।


मैंने बचपन से उज्जैन, शाजापुर और इंदौर जैसे शहरों में संघ की शाखाओं की गतिविधियों को देखा है। मैंने हिन्दुस्थान समाचार से अंशकालिक संवाददाता के रूप में जुड़कर 1971 से 1975 तक दिल्ली में पूर्णकालिक पत्रकार के रूप में कार्य किया। इस दौरान मुझे संघ, भारतीय जनसंघ, कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टियों के नेताओं से मिलने का अवसर मिला।


1975 में इमरजेंसी के दौरान मैंने अहमदाबाद कार्यालय में काम किया। संघ के वरिष्ठ प्रचारक बालेश्वर अग्रवाल ने मुझे नियुक्त किया था। मैंने संघ की गतिविधियों में बदलावों को देखा है, जो सरसंघचालक माधव सदाशिवराव गोलवलकर से लेकर मोहन भागवत तक के कार्यकाल में हुए हैं।


बालेश्वर अग्रवाल के नेतृत्व में संघ ने कांग्रेस और अन्य पार्टियों के साथ संबंध बनाए रखे। संघ की शाखाओं और बौद्धिक विचार-विमर्श कार्यक्रमों को सामान्यतः प्रचारित नहीं किया जाता था। सरसंघचालक नागपुर से दिल्ली आते थे, लेकिन कोई प्रचार नहीं होता था।


संघ ने नागपुर, पुणे, इंदौर, ग्वालियर, लखनऊ, अहमदाबाद और दिल्ली में अपने समाचार पत्र और पत्रिकाएं प्रकाशित करना शुरू किया। पंडित दीनदयाल उपाध्याय, अटल बिहारी वाजपेयी, और अन्य वरिष्ठ प्रचारक इन पत्रिकाओं के संपादन में शामिल थे। इमरजेंसी के दौरान संघ पर प्रतिबंध लगा, लेकिन कई प्रचारक भूमिगत रहकर सूचनाएं फैलाते रहे।


गुजरात में नरेंद्र मोदी ने भूमिगत रहकर समाचारों और विचारों को तैयार किया। इमरजेंसी के बाद 1977 में जनता पार्टी की सरकार बनने पर संघ के नेता पहली बार सूचना प्रसारण मंत्री बने। इसके बाद संघ की गतिविधियों पर लेख छपने लगे।


संघ ने 90 के दशक के बाद अपने प्रचार तंत्र पर ध्यान दिया। एम. जी. वैद्य के बाद राम माधव और अन्य ने संघ की गतिविधियों को प्रसारित करने का कार्य संभाला। अब संघ की शाखाएं 68,651 हो गई हैं और इसका लक्ष्य 100,000 शाखाओं तक पहुंचना है।


संघ, भाजपा और सरकार के संबंधों पर मोहन भागवत ने कहा कि संघ ने तय किया है कि वह रोजमर्रा की राजनीति में नहीं जाएगा। प्रधानमंत्री और अन्य नेता स्वयंसेवक हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वे नागपुर के निर्देश पर चलते हैं।


संघ के नेता भारत में जन्मे लगभग 98 प्रतिशत लोगों को भारतीय हिन्दू मानते हैं, जिसमें विभिन्न धार्मिक समुदाय शामिल हैं। उनका मानना है कि भारत में मुसलमानों में से अधिकांश के पूर्वज इसी देश के हैं।