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समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के बीच संभावित तालमेल की चर्चा

समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के बीच संभावित गठबंधन की चर्चा तेज हो गई है। सपा के नेता कांग्रेस के रवैये को लेकर चिंतित हैं और बसपा के साथ तालमेल की संभावनाओं पर विचार कर रहे हैं। क्या मायावती इस जोखिम को उठाने के लिए तैयार होंगी? जानें इस राजनीतिक समीकरण के पीछे के कारण और संभावनाएं।
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समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के बीच संभावित तालमेल की चर्चा

समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के बीच संभावित तालमेल

समाजवादी पार्टी (सपा) और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के बीच एक बार फिर से गठबंधन की संभावनाएं बढ़ गई हैं। हालांकि, इस संबंध में कोई ठोस संकेत नहीं मिले हैं, लेकिन दोनों पार्टियों के दूसरे स्तर के नेता इस विषय पर चर्चा कर रहे हैं। सपा के नेताओं का कहना है कि कांग्रेस पार्टी का जो रवैया है, वह बिना किसी ठोस आधार के है। कांग्रेस लोकसभा चुनाव में जीत का श्रेय राहुल गांधी को देने का प्रयास कर रही है और अधिक सीटों की मांग कर रही है।


कांग्रेस ने बिहार में इसी तरह की राजनीति करते हुए राजद को नुकसान पहुंचाया और खुद भी कमजोर हुई। महाराष्ट्र में भी उसने अपनी सुविधानुसार अलग रुख अपनाया। आम आदमी पार्टी के साथ भी उसने अपनी सुविधाओं के अनुसार राजनीति की और अब तमिलनाडु में डीएमके पर अधिक सीटों की मांग कर रही है। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के नेता सभी 403 सीटों पर तैयारी की बात कर रहे हैं और अधिक सीटों के लिए दबाव बना रहे हैं।


सपा के नेताओं का मानना है कि अगर कांग्रेस को अधिक सीटें देनी हैं, तो बेहतर होगा कि बसपा के साथ तालमेल किया जाए। उत्तर प्रदेश की 403 सीटों में से बसपा के पास केवल एक सीट है और वह पिछले लोकसभा चुनाव में एक भी सीट नहीं जीत पाई। उसके वोट प्रतिशत में भी गिरावट आई है। बसपा को सत्ता में आने के लिए किसी भी तरह से प्रयास करना होगा, अन्यथा उसका अस्तित्व संकट में पड़ सकता है।


मायावती की पार्टी 2012 से सत्ता से बाहर है और उन्होंने कई चुनावों में हार का सामना किया है। हालांकि, मायावती ने यह घोषणा की है कि उनकी पार्टी गठबंधन नहीं करेगी, लेकिन उनके पार्टी के लोग मानते हैं कि बिना गठबंधन के आगे बढ़ना मुश्किल है। 2019 के लोकसभा चुनाव में बसपा और सपा ने मिलकर चुनाव लड़ा था, जिसमें बसपा को 10 और सपा को 5 सीटें मिली थीं।


मायावती अपने भतीजे आकाश आनंद को राजनीति में स्थापित करने के लिए उप मुख्यमंत्री बना सकती हैं। हालांकि, दोनों पक्षों में आशंकाएं हैं, लेकिन गठबंधन की उम्मीद भी बनी हुई है। यदि दोनों पार्टियों का तालमेल होता है, तो अखिलेश यादव को अधिक राजनीति करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। उत्तर प्रदेश में मुस्लिम, यादव और दलित वोट का प्रतिशत 50 फीसदी है। लेकिन सवाल यह है कि क्या मायावती इस जोखिम को उठाने के लिए तैयार होंगी?