सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी से चुनावी प्रक्रिया में बढ़ी चिंता
सुप्रीम कोर्ट की चिंता
सुप्रीम कोर्ट ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) में कटे नामों के संबंध में जो बातें कहीं हैं, वे भविष्य के लिए गंभीर चिंता का विषय बन सकती हैं। चीफ जस्टिस सूर्यकांत की बेंच ने 13 अप्रैल को सुनवाई के दौरान कहा कि यदि चुनाव में जीत-हार का अंतर कम है और कटे हुए नामों का प्रतिशत अधिक है, तो अदालत हस्तक्षेप कर सकती है। उदाहरण देते हुए बेंच ने कहा कि यदि 15 प्रतिशत नाम कटे हैं और जीत-हार का अंतर 2 प्रतिशत है, तो इस पर विचार करना आवश्यक होगा। यह सर्वोच्च अदालत की मौखिक टिप्पणी है और इसका आदेश का हिस्सा है। अदालत ने यह स्पष्ट किया है कि इस समय वह चुनाव प्रक्रिया में हस्तक्षेप नहीं करेगी। इसका मतलब है कि जिन लोगों के नाम कट गए हैं, वे मतदान नहीं कर पाएंगे, और पश्चिम बंगाल की सभी 294 सीटों के लिए चुनाव 23 और 29 अप्रैल को निर्धारित हैं।
कलकत्ता हाई कोर्ट की रिपोर्ट
कलकत्ता हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट को सूचित किया कि अब तक 34 लाख आपत्तियां प्राप्त हो चुकी हैं, और यह संख्या और बढ़ सकती है। इससे यह स्पष्ट है कि कम से कम 34 लाख लोग मतदान से वंचित रहेंगे। अब सवाल यह उठता है कि अदालत द्वारा उठाए गए मुद्दे, जैसे जीत-हार का अंतर और कटे नामों का प्रतिशत, क्या पूरे एसआईआर के लिए लागू होगा या केवल तार्किक विसंगति के आधार पर कटे नामों के लिए? यदि यह पूरे एसआईआर के लिए है, तो चुनाव के बाद कानूनी विवादों की बाढ़ आ सकती है। यह भी स्पष्ट नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी पूरे राज्य के लिए है या विधानसभा के अनुसार भी यह अंतर महत्वपूर्ण होगा।
राजनीतिक परिणाम
यदि पूरे राज्य की बात करें, तो पिछले चुनाव में तृणमूल कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के बीच 60 लाख वोटों का अंतर था। इस बार एसआईआर में कुल 91 लाख वोट कट गए हैं। यदि अंतिम मतदाता सूची के बाद तार्किक विसंगति के आधार पर कटे नामों की बात करें, तो 27 लाख नाम कटे हैं, जो कुल मतदाताओं का 4 प्रतिशत है। इसका मतलब है कि यदि भाजपा और तृणमूल कांग्रेस के बीच जीत-हार का अंतर 12 प्रतिशत से कम रहता है, तो इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है। यदि तार्किक विसंगति के आधार पर देखा जाए, तो यदि दोनों पार्टियों के बीच जीत-हार का अंतर 4 प्रतिशत से अधिक है, तो इसे भी चुनौती दी जा सकती है।
क्षेत्रीय विवाद
यह स्थिति क्षेत्रवार भी लागू हो सकती है। उदाहरण के लिए, ममता बनर्जी के निर्वाचन क्षेत्र भबानीपुर में 51 हजार नाम कटे हैं, जिनमें से लगभग 38 हजार हिंदू और 13 हजार मुस्लिम मतदाता हैं। यदि जीत-हार का अंतर 51 हजार से कम होता है, तो इस निर्णय को चुनौती दी जाएगी। रिपोर्ट के अनुसार, पिछले चुनाव के नतीजों के आधार पर 44 विधानसभा क्षेत्रों में ऐसे मामले हैं जहां जीत-हार के अंतर से अधिक नाम कट गए हैं। इसलिए, सुप्रीम कोर्ट की मौखिक टिप्पणी से एसआईआर के बाद उत्पन्न समस्याओं का समाधान नहीं होता, बल्कि विवाद बढ़ने की संभावना उत्पन्न होती है। चुनाव के बाद सैकड़ों मुकदमे अदालत में पहुंचने की संभावना है।
