सुप्रीम कोर्ट ने न्यायपालिका की गरिमा को ठेस पहुंचाने पर सख्त चेतावनी दी
सुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख
नई दिल्ली: भारतीय न्यायपालिका की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने वाले एक गंभीर मामले में, सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। बुधवार को एक याचिका की सुनवाई के दौरान, चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने बताया कि याचिकाकर्ता के पिता ने उनके परिवार के सदस्य को फोन कर अदालती आदेश पर सवाल उठाए। कोर्ट ने इसे न केवल न्यायिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप माना, बल्कि इसे 'दुर्व्यवहार' और 'धोखाधड़ी' के रूप में भी देखा।
सुनवाई के दौरान, चीफ जस्टिस ने गंभीरता से कहा कि न्यायपालिका के आदेशों पर इस तरह का निजी दबाव डालना पूरी तरह से अस्वीकार्य है। उन्होंने बताया कि याचिकाकर्ता के पिता ने उनके भाई को फोन किया और पूछा कि ऐसा आदेश कैसे दिया गया। कोर्ट ने इसे सीधे तौर पर अदालती गरिमा के खिलाफ माना। इस दुर्व्यवहार पर नाराजगी जताते हुए बेंच ने पूछा कि क्यों न संबंधित व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्रवाई की जाए।
आरक्षण के लिए धर्म परिवर्तन का विवाद
आरक्षण के लिए धर्म परिवर्तन और 'नए प्रकार की धोखाधड़ी'
यह विवाद निखिल कुमार पुनिया नामक याचिकाकर्ता से संबंधित है। निखिल ने हिंदू धर्म छोड़कर बौद्ध धर्म अपनाया और अब वे अल्पसंख्यक कोटे के तहत आरक्षण की मांग कर रहे हैं। इससे पहले की सुनवाई में कोर्ट ने इस याचिका पर कड़ी आपत्ति जताई थी। जजों ने इसे 'एक नए तरह का फ्रॉड' कहा था। कोर्ट का मानना है कि केवल लाभ प्राप्त करने के उद्देश्य से किया गया धर्म परिवर्तन कानूनी और नैतिक रूप से संदिग्ध है।
वकील की भूमिका पर सवाल
वकील की भूमिका और कोर्ट की कड़ी चेतावनी
अदालत ने याचिकाकर्ता के वकील को भी आड़े हाथों लिया। चीफ जस्टिस ने वकील से कहा कि उन्हें अपने मुवक्किल और उनके परिवार के इस शर्मनाक व्यवहार की पुष्टि करनी चाहिए। कोर्ट ने वकील को स्पष्ट सलाह दी कि मामले की गंभीरता को देखते हुए उन्हें इस केस से हटने पर विचार करना चाहिए। वकील की भूमिका पर सवाल उठाते हुए कोर्ट ने कहा कि कानूनी पेशे में नैतिकता और अदालती प्रोटोकॉल का पालन करना सबसे महत्वपूर्ण है।
